शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (526) गतांक से आगे......

ब्रह्माजी का शिव की क्रोधग्नि को वडवानल की संज्ञा दे समुद्र में स्थापित करके संसार के भय को दूर करना, शिव के विरह से पार्वती का शोक तथा नारदजी के द्वारा उन्हें तपस्या के लिए उपदेशपूर्वक पंचाक्षर मंत्र की प्राप्ति

जिससे सारा आकाश गूंज उठा। उस महान् शब्द के साथ ही कामदेव को दग्ध हुआ देख भयभीत और व्याकुल हुई पार्वती दोनो सखियों के साथ अपने घर चली गयीं। उस शब्द से परिवार सहित हिमवान् भी बड़े विस्मय में पड़ गये और वहां गयी हुई अपनी पुत्री का स्मरण करके उन्हें बड़ा क्लेश हुआ। इतने में ही पार्वती दूरे से आती हुई दिखायी दीं। वे शम्भु के विरह से रो रही थीं। अपनी पुत्री को अत्यन्त विह्नल हुई देख शैलराज हिमवान् को बड़ा शोक हुआ और वे शीघ्र ही उसके पास जा पहुंचे। वे फिर हाथ से उसकी दोनों आंखें पोछकर बोले- शिवे! डरो मत, रोओ मत। ऐसा कहकर अचलेश्वर हिमवान् ने अत्यन्त विह्नल हुई पार्वती को शीघ्र ही गोद में उठा लिया और उसे सांत्वना देते हुए वे अपने घर ले गये। 

कामदेव का दाह करके महादेवजी अदृश्य हो गये थे। अतः उनके विरह से पार्वती अत्यन्त व्याकुल हो उठी थीं। उन्हें कहीं भी सुख या शान्ति नहीं मिलती थी। पिता के घर जाकर जब वे अपनी माता से मिलीं, उस समय पार्वती शिवा ने अपना नया जन्म हुआ माना। वे अपने रूप की निन्दा करने लगीं और बोली- हाय! मैं मारी गयी। सखियों के समझाने पर भी वे गिरिराजकुमारी कुछ समझ नहीं पाती थीं।                           (शेष आगामी अंक में)

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