रूद्र की नेत्राग्नि से काम का भस्म होना, रति का विलाप, देवताओं की प्रार्थना से शिव का काम को द्वापर में प्रद्युम्न रूप से नूतन शरीर की प्राप्ति के लिए वर देना और रति का शम्बर-नगर में जाना
आप कामदेव को शीघ्र जीवन-दान दें तथा रति के प्राणों की रक्षा करें। देवताओं की यह बात सुनकर सबके स्वामी करूणासागर परमेश्वर शिव पुनः प्रसन्न होकर बोले- देवताओं! मैं बहुत प्रसन्न हूं। मैं काम को सबके हृदय में जीवित कर दूंगा। वह सदा मेरा गण होकर विहार करेगा। अब अपने स्थान को जाओ। मैं तुम्हारे दुःख का सर्वथा नाश करूंगा।
ऐसा कहकर रूद्रदेव उस समय स्तुति करने वाले देवताओं के देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। देवताओं का विस्मय दूर हो गया और वे सब-के-सब प्रसन्न हो गये। मुने! तदनन्तर रूद्र की बात पर भरोसा करके स्थिर रहने वाले देवता रति को उनका कथन सुनाकर आश्वासन दे अपने-अपने स्थान को चले गये। मनीश्वर! कामपत्नी रति शिव के बताये हुए शम्बरनगर को चली गयी तथा रूद्रदेव जो समय बताया था, उसकी प्रतीक्षा करने लगी। (अध्याय 18-19)
(शेष आगामी अंक में)
