हवलेश कुमार पटेल, खतौली। एक ओर देश की सरकार के मुखिया बुलेट ट्रेन, सुपर हाइवे जैसी सुविधाएं देने का हर सम्भव प्रयास कर रही है, दूसरी ओर रेलवे अधिकारी पहले से प्राप्त सुविधाओं को बाबा आदम के जमाने यानी बैलगाड़ी के युग में पहुंचाने की मुहिम में जुटे हैं और सबसे हास्यास्पद ये कि किसी को इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है।
ताजा मामला वित्तीय वर्ष 2025-26 के अन्तिम दिवस यानी 31 मार्च 2026 का है। देश की राजधानी स्थित पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन जंक्शन से सायं 6.22 (पीएम) बजे चली सहारनपुर पैसेंजर 54473 ट्रेन 108 किलोमीटर का सफर तय करके खतौली स्टेशन पर दूसरे दिन यानी 12.52 (एएम) बजे पहुंची यानी ट्रेन ने 108 किलोमीटर का सफर 6 घंटा 32 मिनट में तय किया। अगर ट्रेन की औसत गति देखी जाये तो वो मात्र 17.08 किलोमीटर प्रतिघंटा रही, जबकि साईकिल की औसत गति 15 से 20 किलोमीटर प्रतिघंटा मानी जाती है। ट्रेन की रफ्तार का ये आलम तब है, जबकि सरकार ने रेल पटरी को दोहरीकरण, विद्युतीकरण करने के साथ ही ट्रेन की रफ्तार में सबसे बड़ी बाधा मालगाडी के लिए अलग काॅरीडोर तक बना दिया है।
......तो अब रेलवे के अधिकारियों सहित माननीय रेलमंत्री विचार करें कि वे 21वीं सदी में जहां दिल्ली से देहरादून लगभग ढ़ाई सौ किलोमीटर का सफर ढ़ाई घंटे में पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री पूरी जान लगा रखी है और दिल्ली से मेरठ का सफर मात्र 1ा घंटे में समेटने वाली भारत की पहली क्षेत्रीय रेल का उद्घाटन विगत दिनों कर ही चुके हैं, ऐसे में भारतीय रेल का यह सफर हमें किसी दुनिया में ले जा रहा है, इस पर रेलवे के अधिकारियों सहित माननीय रेलमंत्री जी को विचार करने की जरूरत है।
