शि.वा.ब्यूरो, कैलहट। शिवाजी महाराज शोध संस्थान में छत्रपति शिवाजी महाराज की 397वीं जयंती पर बिहार उद्योग विभाग के सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक व मॉ फूलवारी देवी ट्रस्ट लोढ़वां जमालपुर के प्रबंध ट्रस्टी श्रीपति सिंह ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज को इतने वर्षों बाद भी हम श्रद्धा से सम्मान से याद करते हैं। उन्होंने कहा कि कोई नाम, कोई तिथि, कोई स्थान तभी यादगार बनता है, जब उस नाम के साथ, उस तिथि के साथ और उस स्थान के साथ कोई विशेष काम, विशिष्ट उपलब्धि जुड़ी हो। उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज को हम याद करते हैं उनके विलक्षण प्रतिभा वाले व्यक्तित्व के लिए, बिना किसी भेदभाव के सबको न्याय देने के लिए, महिलाओं को समुचित सम्मान देने के लिए, उनके अदम्य साहस के लिए, उनके अद्वितीय सांगठनिक क्षमता के लिए, उनकी स्वराज की भावना के लिए और उस स्वराज को हासिल करने के लिए बेहतरीन युद्ध कौशल और सीमित सैन्य शक्ति के बावजूद छापामार युद्ध के नये सफल प्रयोग के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।
श्रीपति सिंह ने कहा कि उनके स्वराज, जिसे हम हिंदवी स्वराज भी कहते हैं, में अधिक से अधिक स्थानीय लोगों की भागीदारी की गुंजाइश थी, ताकि लोगों को बेहतर शासन मिले, सबको सम्मान मिले और सबको सुविधा मिले, लेकिन यह उस दौर के शासन में इतना आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज के महान व्यक्तित्व में न तो किसी धर्म और जाति के प्रति कट्टरता थी और न ही किसी भी धर्म या जाति के प्रति विरोध था, उनके अंदर सिर्फ और सिर्फ स्वराज की प्रबल भावना थी, जिसे उन्होंने अपने अदम्य साहस, अपनी बेहतरीन युद्ध रणनीति, बाजुओं की ताकत और खुद द्वारा ईजाद किये गये नवाचार युद्ध तकनीकी यानि छापामार युद्ध के बल पर हासिल किया और मराठा साम्राज्य की स्थापना की।
उन्होंने कहा कि शिवाजी की क्षमता को कमतर आंकने वालों ने उनके हिंदवी स्वराज्य को हिंदू स्वराज कह कर उनके साथ अन्याय किया है। उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज मुगल शासन के अत्याचारों के खिलाफ थे, न कि मुसलमानों के खिलाफ। उन्होंने कहा कि उनकी सेना में केवल जांबाज बहादुर सिपाही और सेनापति थे। उन्होंने कहा कि बहादुरी का आधार सिर्फ और सिर्फ बहादुरी थी न कि जाति और धर्म। उन्होंने कहा कि शिवाजी की सेना में हिंदू थे, मुसलमान थे, महार थे, यादव थे, यानी कि हर जाति और धर्म के बहादुर लोग थे।
उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 में शिवनेरी के किला में मराठा कुर्मी कुल भोंसले परिवार में हुआ था, उनके बचपन का नाम शिवाजी राजे भोंसले था। उन्होंने कहा कि शिवाजी की माताजी का नाम जीजाबाई था। जीजाबाई बुलढाना जिले के सिंदखेड़ गांव के जागीरदार लखुजी जाधव की पुत्री थीं। उन्होंने कहा कि शिवाजी राजे भोंसले की माता जीजाबाई ने अपने प्रिय बेटे को देश काल परिस्थिति के अनुरूप उचित और व्यवहारिक शिक्षा एवं संस्कार दिए, जिसमें सैन्य शिक्षण-प्रशिक्षण शामिल था। उन्होंने कहा कि बालक शिवाजी पर अपनी माता-पिता के संस्कारों और आदर्शों का भरपूर असर पड़ा। उन्होंने कहा कि
छत्रपति शिवाजी महाराज की गुरु खुद उनकी माता जीजाबाई थीं और थे संत तुकाराम, उनके गुरु समर्थ रामदास नहीं थे। उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मनाने की शुरुआत महात्मा ज्योतिबा फुले ने की थी। उन्होंने कहा कि पेशवा हमेशा उनके खिलाफ रहे।

