पद्मश्री अवार्ड के लिए चुने गए पीतल पर नक्काशी के कारीगर मुरादाबाद के चिरंजी लाल यादव

गौरव सिंघल, सहारनपुर। इस बार के पद्म पुरस्कारों में पद्मश्री अवार्ड के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पीतल पर नक्काशी के प्रसिद्ध धातु शिल्प कारीगर चिरंजी लाल यादव और सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी के अंतरराष्ट्रीय कारीगर मोहम्मद असलम सैफी प्रमुख दावेदारों में शामिल थे। लेकिन भारत सरकार ने इस बार पीतल पर नक्काशी के कारीगर मुरादाबाद के चिरंजी लाल यादव को पद्मश्री अवार्ड के लिए चुना। जबकि सहारनपुर के विश्व प्रसिद्ध काष्ट कलाकार मोहम्मद असलम सैफी इस अवार्ड को लेने से चूक गए।

मोहम्मद असलम सैफी ने आज बताया कि वह इस अवार्ड को नहीं मिलने से बिल्कुल भी मायूस नहीं हैं और वह 2027 के लिए फिर से आवेदन करेंगे। सहारनपुर की काष्ट कला कारीगरी का इतिहास 400 वर्ष पुराना है। इसकी शुरूआत मोहम्मद असलम सैफी के पुरखों द्वारा की गई थी। असलम सैफी अपने खानदान की पांचवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने लकड़ी पर नक्काशी की बारीकी और शिल्प में मरहूम पिता और दादा एवं ताऊ से विरासत में सीखा था। उनके पिता ने उन्हें जापान में रहकर जापान के विश्व प्रसिद्ध कारीगर से कई वर्ष तक प्रशिक्षण दिलाया था। असलम सैफी ने फ्रांस में भी काष्ट शिल्क की नक्काशी की बारीकियों को सीखा और बाद में वहां के सैकड़ों कारीगरों को इस कला में निपुण किया।
भारत समेत विश्व के 26 मुल्कों में असलम सैफी द्वारा प्रशिक्षित हजारों कारीगर लकड़ी की नक्काशी को जीवंतदा प्रदान करते हैं। सहारनपुर के इतिहास में कभी भी किसी काष्ट कला के कारीगर को पद्म पुरस्कार नहीं मिल पाया है। जिस तरह से सहारनपुर अपनी इस अनूठी कला में  विश्वभर में छाया हुआ है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां की काष्ट कला से अभिभूत हैं और आगे बढ़कर उसको प्रोत्साहन देने में लगे हैं ऐसे में सभी को भरोसा था कि मोहम्मद असलम सैफी को इस कला क्षेत्र का पद्मश्री पुरस्कार अवश्य मिलेगा पर बाजी दूसरी बार भी मुरादाबाद की पीतल नगरी के पक्ष में गई। 2024 में भी मुरादाबाद के बाबूराम यादव को पीतल शिल्प में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया था। उसी साल लकड़ी पर नक्काशी का पद्मश्री पुरस्कार घोषित तो किया गया था लेकिन उसे प्राप्त करने वाले कश्मीर के गुलाम नबी थे।
अब देखना है कि भारत को लकड़ी की नक्काशी के जरिए अरबों- खरबों डालर की विदेशी मुद्रा दिलाने वाले सहारनपुर के कारीगरों को कब भारत सरकार अपनी मान्यता देती है और कब यहां के कारीगरों को भी पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा। सहारनपुर में अभी तक चार लोगों को पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका है। इनमें काफी पहले यह पुरस्कार सहारनपुर के प्रसिद्ध चिकित्सक रामनारायण बागले को मिला था। उसके बाद देवबंद के मूल निवासी और प्रमुख साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सैनानी गांधीवादी विचारक पंड़ित कन्हैया लाल मिश्र को पद्मश्री पुरस्कार से विभूषित किया गया था। उसके बाद सहारनपुर के प्रतिभाशाली शरीर श्रोष्ठव के क्षेत्र में प्रसिद्ध योगाचार्य भारत भूषण को पद्मश्री अवार्ड मिला था और तीन वर्ष पूर्व कृषि वैज्ञानिक चौधरी सेठपाल सिंह को खेतीबाड़ी के विविधकरण के लिए पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया था। माना जा रहा है कि यदि इस बार लकड़ी की नक्काशी के लिए सहारनपुर के असलम सैफी का चयन किया गया होता तो अपने आप में यह यह बड़ी बात होती। लेकिन ना जाने चयनकर्त्ताओं द्वारा कहां चूक हो गई।

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