सुरेंद्र सिंघल, नई दिल्ली। भारत के प्रख्यात विधिवेत्ता एवं सर्वोच्च न्यायालय के 50वें पूर्व मुख्य न्यायाधीश डा0 धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ (डा0 डीवाई चंद्रचूड) की हाल ही में उनके भाषणों पर आधारित महत्वपूर्ण पुस्तक संविधान क्यों मायने रखता है प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक विधि विद्वानों और उन सभी के लिए अनिवार्य रूप से पढ़ने योग्य है जो लोकतंत्र, न्याय और विधि के शासन को महत्व देते हैं। न्यायमूर्ति डा0 चंद्रचूड़ इस बात पर जोर देते हैं कि संविधान केवल एक दस्तावेज मात्र नहीं है बल्कि यह एक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज की नींव है। डा0 चंद्रचूड़ हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट दोनों में मिलाकर करीब 24 वर्ष तक न्यायाधीश रहे। वह 2016 में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बने थे और 9 नवंबर 2022 से 10 नवंबर 2024 तक सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे। अपने लंबे कार्यकाल के दौरान विभिन्न अवसरों पर उन्होंने महत्वपूर्ण मुद्दों पर जो भाषण दिए हैं वे 489 पेज की इस मूल्यवान पुस्तक में दर्ज है जो कानून के छात्रों, वकीलों, जजों, पत्रकारों और इतिहासकारों के लिए पढ़ने की दृष्टि से अनिवार्य है। उनके भाषण की सामग्री और विचारों से डा0 चंद्रचूड़ के विद्वान, विचारक और श्रेष्ठ व्यक्तित्व के धनी होने का पता चलता है। वह स्वतंत्रता, गरिमा, नैतिकता, सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता, पर्यावरण विषयों को लेकर गंभीरता, न्यायप्रियता, संवेदनशीलता, करूणा और समाज के उपेक्षित और सबसे दबे-कुचले लोगों के उत्थान और कल्याण के लिए भी अपनी ख्याति रखते हैं। इन पंक्तियों के लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र सिंघल को डा0 चंद्रचूड़ से उनके मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल के दौरान कई अवसरों पर नजदीक से मिलने और उन्हें सुनने का अवसर मिला है। पहला मौका तब था जब डा0 चंद्रचूड़ इंडियन एक्सप्रेस द्वारा उसके संस्थापक रामनाथ गोयनका पुरस्कार समारोह में नई दिल्ली के आईटीसी मौर्य होटल में चयनित श्रेष्ठ पत्रकारों को आवार्ड देने के लिए आए थे। उस दौरान इस ग्रुप के चेयरमैन विवेक गोयनका ने सीजेआई डा0 चंद्रचूड़ से इन पंक्तियों के लेखक पत्रकार सुरेंद्र सिंघल का यह कहते हुए परिचय कराया था कि वह उनके पिता आरएनजी के समय से ही एक्सप्रेस के पुरस्कार समारोह में शामिल होते रहे हैं। इनकी लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता में गहरी निष्ठा है। डा0 चंद्रचूड़ ने गर्मजोशी से हाथ मिलाकर अभिवादन स्वीकार किया था और भरोसा दिया था कि वह सीजेआई के रूप में प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मजबूती के लिए खासतौर से अपना पूरा योगदान देंगे। ऐसा उन्होंने करके भी दिखाया।
समारोह में उनके भाषण का जो विषय था वह था नए युग में पत्रकारिता, चुनौतियां, जिम्मेदारियां और उत्कृष्टता। 11 नवंबर 1959 में जन्में डा0 चंद्रचूड़ ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी और दुनिया की मशहूर यूनिवर्सिटी अमेरिका के हारर्वड विश्वविद्यालय से एलएलएम और डाक्टरेट की थी। वह इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहे। दूसरी बार डा0 डीवाई चंद्रचूड़ से इन पंक्तियों के लेखक वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र सिंघल की मुलाकात कांस्टीट्यूशन क्लब, नई दिल्ली में कैपिटल फाउंडेशन आफ इंडिया द्वारा 4 नवंबर 2023 को आयोजित समारोह में हुई जहां इन पंक्तियों के लेखक सुरेंद्र सिंघल ने उन्हें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित स्वयं द्वारा लिखित लेख की प्रति भेंट की थी। न्यायामूर्ति डा0 चंद्रचूड़ ने अपनी सेवानिवृत्ति पर मीडिया से मुखातिब व्यक्त विचारों में दो-टूक कहा कि उन्होंने उस व्यवस्था को बेहतर बनाया है जो उन्हें सीजेआई बनने के वक्त विरासत में मिली थी। उन्होंने दिव्यांग अधिकारों, सूचना के अधिकार, आर्थिक संवाद, लिंग और जातिगत भेदभाव के संदर्भ में समान अवसर के सिद्धांत पर कई भाषण दिए। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ नफरत फैलाने वाले भाषणों के असर पर भी उन्होंने कई बार चिंता व्यक्त की और कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषणों का असर कई गुणा बढ़ गया है जो लोगों के मन और भावनाओं पर गहरा असर डालता है। अपनी सेवानिवृत्ति पर उनका कहना था कि जरूरतमंदों की सेवाएं ही सबसे बड़ी भावना है। कोई भी व्यक्ति संस्था से बड़ा नहीं होता। प्रवासी पक्षी की तरह सभी आते-जाते रहते हैं। डा0 चंद्रचूड़ ने अदालती कार्यवाही की लाइव इस्ट्रीमिंग और टेक्नोलोजी के माध्यम से न्याय को आम लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने सेना में महिलाओं के लिए स्थाई कमीशन, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और गर्भपात कानूनों में अविवाहित महिलाओं को शामिल करने जैसे महत्वपूर्ण फैसले दिए जो महिला सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण है।।उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक होने के साथ-साथ नफरत भरे भाषणों को एक गंभीर चिंता बताया कहा कि स्वतंत्रता उचित प्रतिबंधों के अधीन है। डा0 डीवाई चंद्रचूड़ का दृढ़ मत है कि लोकतंत्र के समान कोई घटक नहीं है जिन्हें हर देश को यह तय करने के लिए पूरा करना चाहिए कि वह लोकतंत्र के लिए काम कर रहा है। भारत में लोकतांत्रिक कामकाज का आधार जहां हम अपनी अनूठी समस्याओं के आधार से अलग हैं। भारत में हम लोकतंत्र की केवल राजनैतिक समझ को नहीं मानते हैं। चुनाव या प्रतिनिधित्व से संबंधित मुद्दे जैसे मतदान का अधिकार या सीमा निर्धारण, लोकतांत्रिक शासन का हिस्सा है। हम सामाजिक लोकतंत्र में विश्वास करते हैं। जैसे भेदभाव का अभाव, अवसर की वास्तविक समानता सुनिश्चित करना, लोकतंत्र के आधारों का उल्लंघन ना हो और लोकतांत्रिक नींव की मूल्य पर टिकी होती है, उन्हें बढ़ावा मिले। एक भाषण में डा0 चंद्रचूड़ कहते हैं कि की-बोर्ड यौद्धाओं की संख्या बढ़ती जा रही है जो सिर्फ ध्यान आकर्षित करने के लिए और सार्वजनिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करते हुए बातें कहते हैं। आहत करने वाली टिप्पणियों का लोगों के मानस और भावनात्मक स्वास्थ्य पर दूरगामी परिणाम होते हैं। सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण करने के लिए हम खुद को समर्पित करते हैं। वह कहते हैं कि आठ साल के उनके सुप्रीम कोर्ट के निजी अनुभवों से उन्हें न्याय और अन्याय की छवि का अहसास हुआ कि कैसे छोटे-छोटे अपराधों में शामिल साधनहीन और बिना पढ़े-लिखे गरीब और विचाराधीन कैदी जमानत में विलंब होने से जेलों में पड़े रहते हैं। ऐसे में उनकी और सामान्य नागरिकों की न्याय व्यवस्था में आस्था कैसे दृढ़ हो सकती है। जाहिर है न्याय प्रणाली की इस विसंगति को दूर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्याय प्रणाली में सामान्य नागरिकों की आस्था को दृढ़ करने के लिए कदम उठाने ही चाहिए। एक अन्य भाषण में डा0 चंद्रचूड़ ने कहा कि जिला और सत्र न्यायालयों को हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट की अधीनस्थ अदालतें मानने की प्रवृत्ति का परित्याग करके हमें उन अदालतों को बराबरी, समानता की श्रेणी में लाना होगा। उससे उनके कार्यों में हम गरिमा और गौरव ला सकेंगे। जिला एवं सत्र न्यायालयों की गरिमा नागरिकों की गरिमा से जुड़ी हुई है। न्यायपालिका का लक्ष्य सामान्य नागरिकों को न्याय दिलाना है। वादकारियों को उपलब्धियां प्राप्त हों, समय पर सुनवाई हो, मुकदमों के बारे में जानकारियां आसानी से मिल जाएं, फैसलों के दस्तावेज अतिशीघ्र प्राप्त कराएं जाएं, कचहरी में साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल, भोजन और महिलाओं के लिए अलग शौचालयों की समुचित व्यवस्था हो। उन्होंने कहा कि भारत में 6 लाख 40 हजार के करीब गांव ऐसे हैं जहां पिछड़ी जातियों, आदिवासियों और गरीबों एवं अशिक्षितों के पास अपनी जमीनों के दस्तावेज तक नहीं है। हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट को उन तक अपनी पहुंच बनानी होगी। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कामकाज की भाषा अंग्रेजी है। सुप्रीम कोर्ट के लोगों को हिंदी और दूसरी भाषाओं में अनुवाद कराकर दिया जाना चाहिए। इस पर काफी काम हुआ है।
