आषाढ़ मास की संकष्टी की पूजा 3 जुलाई को, यश, कीर्ति और सामाजिक सम्मान दिलाती है गजानन चतुर्थी की पूजा

पंडित लक्ष्मी प्रसाद मैंदुली, खतौली। जुलाई माह की तीन तारीख यानी लगभग दोपहर से आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार चतुर्थी तिथि हर माह दो बार आती है एक शुक्ल पक्ष में दूसरा कृष्ण पक्ष में। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी चतुर्थी कहते हैं और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी के नाम से जाना जाता है। 

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है, इसलिए संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत रखने से सभी कष्ट और विघ्न दूर होते हैं। इस दिन भगवान गणेश के साथ-साथ शिव परिवार की पूजा करने से भी विशेष फल मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन गणेश जी की पूजा करने से व्यक्ति के सभी कार्य निर्विघ्न पूरे होते हैं। संस्कृत शब्द संकष्टी का अर्थ ही कष्ट या संकटों का नाश करना होता है। इस दिन व्रत रखने और गणपति की पूजा करने से मानसिक तनाव, आर्थिक परेशानियां और विवाह संबंधी बाधाएं दूर होती हैं। संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। संकष्टी का अर्थ है संकटों से मुक्ति। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक गणेश जी की पूजा करने से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस दिन सुबह स्नानादि के बाद भगवान गणेश का ध्यान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। शाम के समय गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाया जाता है और उन्हें दूर्वा (घास), मोदक, और फल अर्पित किए जाते हैं। इस व्रत में रात के समय चंद्रमा को अघ्र्य (जल चढ़ाना) देना अत्यंत अनिवार्य माना गया है। चंद्रमा की पूजा के बाद ही व्रत को खोला जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र और मंगल ग्रह से संबंधित दोषों को शांत करने में सहायक होता है। यह व्रत मन की चंचलता और क्रोध को नियंत्रित करने में भी उपयोगी माना गया है।

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान गणेश आज के दिन अपने जीवन के सबसे बड़े संकट से निकलकर आए थे, इसलिए इसे सकट चैथ कहा जाता है। एक बार मां पार्वती स्नान के लिए गई हुईं थी तो उन्होंने दरबार पर गणेश को पहरा देने के लिए खड़ा कर दिया। माता पार्वती ने किसी को भी अंदर नहीं आने देने के लिए कहा। तभी भगवान शिव माता पार्वती से मिलने के लिए आ गए। भगवान शिव जब अंदर जाने लगे तो भगवान गणेश ने उनको जाने से मना कर दिया। इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती बाहर निकलकर अपने पुत्र का यह हाल देखा तो बहुत जोर विलाप करने लगीं और अपने पुत्र को जीवित करने का हठ करने लगीं। जब माता पार्वती ने शिव से बहुत अनुरोध किया तो भगवान गणेश को हाथी का सिर लगाकर दूसरा जीवन दिया गया और तब से भगवान गणेश, गजानन के नाम से जाने लगे। तभी से यह तिथि गणपति पूजन की तिथि बन गई। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सबकी मनोकामना पूरी होती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार चैत्र मास की संकष्टी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व विघ्नों के नाश और नए कार्यों की शुभ शुरुआत के लिए माना जाता है।

2- वैशाख मास की संकष्टी को विक्रट चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व साहस, आत्मबल और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हेतु माना जाता है।

3- ज्येष्ठ मास की संकष्टी को एकदंत चतुर्थी कहा  जाता है। इसका महत्व  एकाग्रता, त्याग और ज्ञान की प्राप्ति के लिए माना जाता है।

4- आषाढ़ मास की संकष्टी को गजानन चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व यश, कीर्ति और सामाजिक सम्मान के लिए जाना जाता है।

5- श्रावण मास की संकष्टी को हेरम्ब चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व संकटों से रक्षा और पारिवारिक सुरक्षा हेतु जाना जाता है।

6- भाद्रपद मास की संकष्टी को विघ्नराज चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) कहा जाता है। इसका महत्व सर्वाधिक पूज्य, सभी विघ्नों के नाश हेतु जाना जाता है।

7- आश्विन मास की संकष्टी को वक्रतुण्ड चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व रोग, भय और मानसिक अशांति से मुक्ति के लिए जाना जाता है।

8- कार्तिक मास की संकष्टी को कुबेर चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व धन, ऐश्वर्य और आर्थिक स्थिरता हेतु जाना जाता है।

9- मार्गशीर्ष (अग्रहायण) मास की संकष्टी को लंबोदर चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व कर्ज मुक्ति, शांति और संतुलित जीवन के लिए जाना जाता है।

10- पौष मास की संकष्टी को द्वैमातुर चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व मातृ-पितृ कृपा और पारिवारिक सौहार्द हेतु जाना जाता है।

11- माघ मास की संकष्टी को तिलकुटा चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व पुण्य, तप और आध्यात्मिक उन्नति के लिए जाना जाता है। 

12- फाल्गुन मास की संकष्टी को धूम्रवर्ण चतुर्थी कहा जाता है। इसका महत्व पाप नाश, ग्रह दोष शांति और आत्मशुद्धि हेतु जाना जाता है।

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