शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (531) गतांक से आगे......

श्री शिव की आराधना के लिए पार्वती जी की दुष्कर तपस्या

ब्रह्माजी कहते हैं-देवर्षे! तुम्हारे चले जाने पर प्रफुल्लित हुई पार्वती ने महादेवजी को तपस्या से ही साध्य माना और तपस्या के लिए ही मन में निश्चय किया। तब उन्होंने अपनी सखी  जया और विजया के द्वारा पिता हिमाचल और माता मेना से आज्ञा मांगी। पिता ने तो स्वीकार कर लिया, माता मेना ने स्नेहवश अनेक प्रकार से समझाया और घर से दूर वन में जाकर तप करने से पुत्री को रोका। मेना ने तपस्या के लिए वन में जाने से रोकते हुए (उ), (मा) (बाहर न जाओ) ऐसा कहा, इसलिए उस समय शिवा का नाम उमा हो गया। मुने! शैलराज  की प्यारी पत्नी मेना ने रोकने से शिवा को दुखी हुई जान अपना विचार बदल दिया और पार्वती को तपस्या के लिए जाने की आज्ञा दे दी। मुनिश्रेष्ठ! माता की वह आज्ञा पाकर उत्तर व्रत का पालन करने वाली पार्वती ने भगवान् शंकर का स्मरण करके अपने मन में बड़े सुख का अनुभव किया। माता-पिता को प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करके शिव के स्मरणपूर्वक दोनो सखियों के साथ वे तपस्या करने चली गयीं। अनेक प्रकार के  वस्त्रों का परित्याग करके पार्वती ने कटि प्रदेश में सुन्दर मूंज की मेखला बांध शीघ्र ही वल्कल धारण कर लिये। हार का परित्याग करके उत्तम मृगचर्म को हृदय से लगाया। तत्पश्चात वे तपस्या के लिए गंगावतरण (गंगोत्री) तीर्थ की ओर चलीं।

जहां ध्यान लगाते हुए भगवान् शंकर ने कामदेव को दग्ध किया था, हिमालय का वह शिखर गंगावतरण के नाम से प्रसिद्ध है। वहीं परम उत्तम शृंगितीर्थ में पार्वती ने तपस्या प्रारम्भ की। गौरी के तप करने से ही उसका गौरी शिखर नाम हो गया। मुने! शिवा ने अपने तप की परीक्षा के लिए वहां बहुत से सुन्दर एवं पवित्र वृक्ष लगाये,  

                                                           (शेष आगामी अंक में)

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