ब्रह्माजी का शिव की क्रोधग्नि को वडवानल की संज्ञा दे समुद्र में स्थापित करके संसार के भय को दूर करना, शिव के विरह से पार्वती का शोक तथा नारदजी के द्वारा उन्हें तपस्या के लिए उपदेशपूर्वक पंचाक्षर मंत्रा की प्राप्ति
भगवान् शंकर को बहुत ही प्रिय है तथा साधक को भोग और मोक्ष देने में समर्थ है। सौभाग्यशालिनी! इस मंत्र का विधिपूर्वक जप करने से तुम्हारे द्वारा आराधित हुए भगवान् शिव अवश्य और शीघ्र तुम्हारी आंखों के सामने प्रकट हो जायेंगे। शिवे! शौच-संतोषादि नियमों में तत्पर रहकर भगवान् शिव के स्वरूप का चिन्तन करती हुई तुम पंचाक्षर मंत्र का जप करो। इससे आराध्य देव शिव शीघ्र ही संतुष्ट होंगेे। साध्वी! इस तरह तपस्या करो। तपस्या से ही सबको मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं।
ब्रह्मा जी कहते हैं-नारद! तुम भगवान् शिव के प्रिय भक्त और इच्छानुसार विचरन करने वाले हो। तुमने काली से उपर्युक्त बात कहकर देवताओं के हित में तत्पर हो स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। तुम्हारी बात सुनकर उस समय पार्वती बहुत प्रसन्न हुई। उन्हें परम उत्तम पंचाक्षर मंत्र प्राप्त हो गया। (शेष आगामी अंक में)
