शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (528) गतांक से आगे......

ब्रह्माजी का शिव की क्रोधग्नि को वडवानल की संज्ञा दे समुद्र में स्थापित करके संसार के भय को दूर करना, शिव के विरह से पार्वती का शोक तथा नारदजी के द्वारा उन्हें तपस्या के लिए उपदेशपूर्वक पंचाक्षर मंत्र की प्राप्ति 

किसी तरह उसने महादेवजी की सेवा आरम्भ की और किस तरह उनके द्वारा कामदेव का दहन हुआ- यह सब कुछ बताया। मुने! भगवान् शिव का भजन करो। फिर उनसे विदा लेकर तुम उठे और मन-ही-मन शिव का स्मरण करके शैलराज को छोड़ शीघ्र ही एकान्त में काली के पास आ गये। मुने! तुम लोकोपकारी, ज्ञानी तथा शिव के प्रिय भक्त हो, समस्त ज्ञानवानों के शिरोमणि हो, अतः काली के पास आ उसे सम्बोधित करके उसी के हित में स्थित हो उससे सादर यह सत्य वचन बोले।

नारदी जी ने (तुमने) कहा-कालिके! तुम मेरी बात सुनो। मैं दयावश सच्ची बात कह रहा हूं। मेरा वचन तुम्हारे लिए सर्वथा हितकर, निर्दोष तथा उत्तम काम्य वस्तुओं को देने वाला होगा। तुमने यहां महादेवजी की सेवा अवश्य की थी, परन्तु वह बिना तपस्या के गर्वयुक्त होकर की थी। दीनों पर अनुग्रह करने वाले शिव ने तुम्हारे उसी गर्व को नष्ट किया है। शिवे! तुम्हारे स्वामी महेश्वर विरक्त और महायोगी हैं। उन्होंने केवल कामदेव को जलाकर जो तुम्हें सकुशल छोड़ दिया है, उसमें यही कारण है कि वे भगवान् भक्तवत्सल हैं। अतः तुम उत्तम तपस्या में संलग्न हो चिरकाल तक महेश्वर की आराधना करो।                                (शेष आगामी अंक में)

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