शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (529) गतांक से आगे......

ब्रह्माजी का शिव की क्रोधग्नि को वडवानल की संज्ञा दे समुद्र में स्थापित करके संसार के भय को दूर करना, शिव के विरह से पार्वती का शोक तथा नारदजी के द्वारा उन्हें तपस्या के लिए उपदेशपूर्वक पंचाक्षर मंत्र की प्राप्ति

तपस्या से तुम्हारा संस्कार हो जाने पर रूद्रदेव तुम्हें अपनी सहधर्मिणी बनायेंगे और तुम भी कभी उन कल्याणकारी शम्भु का परित्याग नहीं करोगी। देवि! तुम हठपूर्वक शिव को अपनाने का यत्न करो। शिव के सिवा दूसरे किसी को अपना पति स्वीकार न करना।

ब्रह्माजी कहते हैं-मुने! तुम्हारी यह बात सुनकर गिरिराज कुमारी काली कुछ उल्लसित हो तुमसे हाथ जोड़कर प्रसन्नतापूर्वक बोली।

शिवा ने कहा- प्रभो! आप सर्वज्ञ तथा जगत् का उपकार करने वाले हैं। मुने! मुझे रूद्रदेव की आराधना के लिए कोई मंत्र दीजिये।

ब्रह्माजी ने कहा- नारद! पार्वती का यह वचन सुनकर तुमने पंचाक्षर शिवमंत्र (नमः शिवाय) का उन्हें विधिपूर्वक उपदेश किया। साथ ही उस मंत्रराज में श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए तुमने उसका सबसे अधिक प्रभाव बताया।

नारद (तुम) बोले-देवि! इस मंत्र का परम अद्भुत प्रभाव सुनो। इसके श्रवणमात्र से भगवान् शंकर प्रसन्न हो जाते हैं। यह मंत्र सब मंत्रों का राजा और मनोवांछित फल को  देने वाला है।                             (शेष आगामी अंक में)

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