शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (512) गतांक से आगे......

रूद्र की नेत्राग्नि से काम का भस्म होना, रति का विलाप, देवताओं की प्रार्थना से शिव का काम को द्वापर में प्रद्युम्न रूप से नूतन शरीर की प्राप्ति के लिए वर देना और रति का शम्बर-नगर में जाना 

पति की मृत्यु के दुख से वह इस तरह पड़ी थी, मानो मर गयी हो। थोड़ी देर में जब होश हुआ, तब अत्यन्त व्याकुल हो रति उस समय तरह-तरह की बातें कहकर विलाप करने लगी। रति बोली-हाय! मैं क्या करूं? कहां जाऊं? देवताओं ने यह क्या किया। मेरे उद्दण स्वामी को बुलाकर नष्ट करा दिया। हाय! हाय! नाथ! स्मर! स्वामिन्! प्राणप्रिय! हा मुझे सुख देने वाले प्रियतम! हा प्राणनाथ! यह यहां क्या हो गया?

ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! इस प्रकार रोती, बिलखती और अनेक प्रकार की बाते कहती हुई रति हाथ-पैर पटकने और अपने सिर के बालों को नोचने लगी। उस समय उसका विलाप सुनकर वहां रहने वाले समस्त वनवासी जीव तथा वृक्ष आदि स्थावर प्राणी भी बहुत दुखी हो गये। इसी बीच इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता महादेवजी का स्मरण करते हुए रति को आश्वासन दे इस प्रकार बोले।

देवताओं ने कहा-तुम काम के शरीर का थोड़ा सा भस्म लेकर उसे यत्नपूर्वक रखो और भय छोड़ो। हम सबके स्वामी महादेव जी कामदेव को पुनः जीवित कर देंगे और तुम फिर अपने प्रियतम को प्राप्त कर लोगी। कोई किसी को न तो सुख देने वाला है और न कोई दुख ही देने वाला है। (शेष आगामी अंक में)

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