रूद्र की नेत्राग्नि से काम का भस्म होना, रति का विलाप, देवताओं की प्रार्थना से शिव का काम को द्वापर में प्रद्युम्न रूप से नूतन शरीर की प्राप्ति के लिए वर देना और रति का शम्बर-नगर में जाना
और इन्द्र आदि समस्त देवताओं का स्मरण करने लगा। मुनिश्रेष्ठ! अपना प्रयास निष्फल हो जाने पर काम भय से व्याकुल हो उठा था। मुनीश्वर! काम के स्मरण करने पर वे इन्द्र आदि सब देवता वहां आ पहुंचे और शम्भु को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे। देवता स्तुति कर ही रहे थे कि कुपित हुए भगवान् हर के ललाट क मध्य भाग में स्थित तृतीय नेत्र से बड़ी भारी आग तत्काल प्रकट होकर निकली। उसकी ज्वालाएं ऊपर की ओर उठ रही थीं। वह आग धू-धू करके जलने लगी। उसकी प्रभा प्रलयाग्नि के समान जान पड़ती थी। वह आग तुरंत ही आकाश में उछली और पृथ्वी पर गिर पड़ी। फिर अपने चारों ओर चक्कर काटती हुई धराशायिनी हो गयी। साधो! भगवन्! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये यह बात जब तक देवताओं के मुख से निकले, तब तक ही उस आग ने कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। उस वीर कामदेव के मारे जाने पर देवताओं को बड़ा दुख हुआ। वे व्याकुल हो हाय! यह क्या हुआ? ऐसा कह-कहकर जोर-जोर से चीत्कार करते हुए रोने बिलखने लगे।
उस समय विकृतचित्त हुई पार्वती का सारा शरीर सफेद पड़ गया-काटो तो खून नहीं। वे सखियों को साथ ले अपने भवन को चली गयीं। कामदेव के जल जाने पर रति वहां एक क्षण तक अचेत पड़ी रहीं।
(शेष आगामी अंक में)
