सुरेंद्र सिंघल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
उत्तर प्रदेश में सियासी दल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुट गए हैं। 2024 लोकसभा चुनावों में शानदार उपलब्धि हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी के हौंसले बुलंद हैं। भाजपा को राज करते हुए 10 साल हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश का समाज बिहार की तरह जातियों और धर्म में बंटा हुआ है। अभी हाल ही में बिहार में भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर शानदार उपलब्धि हासिल की है। बड़ा सवाल है कि क्या भाजपा उत्तर प्रदेश में बिहार को दोहरा पाएगी?
भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पूंजी उसके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। उनका कद सूबे की दीवारों से ऊंचा हो गया है और उनकी राष्ट्र व्यापी ख्याति है। सूबाई क्षत्रपों में वह सबसे कद्दावर और वजनदार नेता हैं। नरेंद्र मोदी, अमित शाह के बाद तीसरे स्थान पर योगी आदित्यनाथ है। लेकिन अनेकानेक कारणों से भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना कम बड़ी चुनौती नहीं होगा। नरेंद्र मोदी भले ही गुजरात के हों लेकिन संसद में 2014 से उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। भाजपा ने 2014 में जिस रणनीति के तहत मोदी को बनारस से चुनाव मैदान में उतारा था वह इस मायने में कारगर साबित हुई कि 15 साल के वनवास के बाद 2017 में उसे यूपी में सत्ता मिली और वह भी अपने बलबूते पर। इस सफलता का श्रेय नरेंद्र मोदी को है। संयोग से कहिए या ईश्वर कृपा से उत्तर प्रदेश एवं भाजपा दोनों को योगी आदित्यनाथ जैसा सधा व्यक्तित्व मिला। बिजनौर के युवा लोकप्रिय सांसद चंदन चौहान जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है और जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत के जानकार माने जाते हैं कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ को सूबे के लोग दिल से पसंद करते हैं। उन्होंने शानदार कानून व्यवस्था दी, अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण किया और साथ ही वह किसानों के सच्चे हितेषी साबित हुए जो किसानों की पीड़ा को महसूस करते हैं और उसे दूर करने को हर समय तत्पर रहते हैं। इस सबके बावजूद भाजपा के सामने परेशानियां कम नहीं हैं। बड़ी संख्या में इसके विधायकों, मंत्रियों का कामकाज जनअपेक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतरा। उन्हें बदलना, नए उम्मीदवारों का चयन करने का काम भाजपा नेतृत्व को अभी से करना होगा। 10-15 सालों से भाजपा संगठन का काम भी बहुत संतोषजनक नहीं है। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की कमियों को मोदी-योगी के बावजूद उजागर कर दिया। सियासी जानकारों की टिप्पणी है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में अमित शाह खुद को मैदान में नहीं उतारते तो भाजपा को शायद ही सत्ता प्राप्त हो पाती। लोकसभा चुनावों में अमित शाह की दूरी को भी खराब नतीजों के लिए एक बड़ी वजह माना गया। यह तथ्य सर्वविदित है कि अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के बीच ना पाटे जाने वाली दूरी बनी हुई है। इसका 2027 के नतीजों पर क्या असर पड़ता है इसका मूल्यांकन करना भी जरूरी है। उत्तर प्रदेश में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सियासी माहौल महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। भाजपा का प्रदर्शन पश्चिम में यदि बेहतर रहता है तो भाजपा को तीसरी बार सत्ता मिलना मुश्किल नहीं होगा। इसका संगठन बेदम और नेतृत्व प्रभावहीन है। मौजूदा एवं पिछले दो-तीन अध्यक्षों का कामकाज किसी भी लिहाज से बेहतर नहीं रहा। लेकिन इन कमियो-खामियों को नजरंदाज करने का खामियाजा भाजपा को 2024 में उठाना पड़ा। 2014 और 2019 में देश में बनने वाली सरकार मोदी सरकार कहलाई। जो यूपी में खराब नतीजे मिलने से 2024 में मोदी के बजाए एनडीए सरकार कहलाने लगी। इसलिए यदि नेतृत्व या थिंकटैंक खुद की गलतियों में सुधार नहीं करता है तो उत्तर प्रदेश में वह सत्ता गंवा भी सकती है। ऐसी हालत में भाजपा का ग्राफ तेजी से नीचे गिरेगा। पिछले छह साल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन में 31 सदस्यीय कार्यकारिणी ज्यों-की-त्यों रही। 2020 में भूपेंद्र चौधरी के बाद शामली का एक नौजवान महत्वकांक्षी जाट मोहित बेनीवाल अध्यक्ष बनाए गए थे। उनके बाद गाजियाबाद के सत्येंद्र सिसौदिया को यह जिम्मेदारी दी गई जिनका अपना खुद का ना तो कोई जनाधार है और ना ही कोई संगठनात्मक कौशल दिखा पाए। मोहित बेनीवाल की एमएलसी बनने की इच्छा जरूर पूरी हो गई। लेकिन उसका कोई लाभ भाजपा को नहीं मिला। जयंत चौधरी के भाजपा के साथ आने के बावजूद मुजफ्फरनगर में संजीव बालियान की हार भाजपा के लिए ऐसा सबक है जिसके उत्तर उसे खोजने ही चाहिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जो सामाजिक बुनावट है उसमें जाट बिरादरी को वर्चस्व वाली समूह के रूप में देखा जाता है। उसको बढ़ावा देना कभी-कभी फायदे के साथ-साथ नुकसानदेह भी साबित होता है। ओबीसी समेत दूसरी जातियां जाटों से दिक्कत महसूस करती हैं। हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान में भाजपा की रणनीति सफल होने का कारण जाटों से एक उचित दूरी बनाकर रखना भी रहा। फिर भी सोमपाल शास्त्री, सुधीर बालियान, चौधरी अजीत सिंह, जयंत चौधरी, जयप्रकाश तोमर और बागपत के पूर्व सांसद सत्यपाल सिंह तोमर जैसा विनम्र और सबको साथ लेने वाला जाट नेतृत्व कारगर रहा है। इसी स्वभाव का कोई भी जाट अध्यक्ष बनाया जाता है तो अपेक्षित नतीजे मिलेंगे। उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक दृष्टि से भाजपा के छह क्षेत्र हैं। जातीय हिसाब से एक ब्राह्मण, एक राजपूत, एक बनिया, एक दलित और दो ओबीसी अध्यक्ष बनने चाहिए। लेकिन भूपेंद्र चौधरी ने पिछली बार कोई भी बनिया अध्यक्ष नहीं बनाया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बनिया बिरादरी का जबरदस्त राजनीतिक, सामाजिक प्रभाव है। भाजपा जैसी पार्टी जिसे बनियों की पार्टी भी माना और कहा जाता है उसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केवल तीन ही वैश्य बिरादरी के विधायक हैं। एक मुजफ्फरनगर के कपिल देव अग्रवाल, दूसरे मेरठ कैंट के अमित अग्रवाल और तीसरे मुरादाबाद नगर के रितेश गुप्ता शामिल हैं। केवल एक सांसद गाजियाबाद से अतुल गर्ग हैं। वैश्य बिरादरी से पश्चिम भाजपा संगठन अध्यक्ष पद के लिए सहारनपुर के तीन बार विधायक और तीन बार मंत्री रहे संजय गर्ग और मौजूदा कमेटी में पांच साल से महामंत्री पद पर कार्यरत विकास अग्रवाल जो पूर्व में हापुड़ के जिलाध्यक्ष भी रहे, प्रमुख दावेदारों में शामिल हैं।जाट बिरादरी में सबसे उपयुक्त नाम बागपत के प्रमुख और जनाधार वाले किसान नेता जयप्रकाश तोमर का नाम लिया जा रहा है। जिनकी लोकप्रियता अपनी बिरादरी के साथ-साथ सभी भाजपा से जुड़ी बिरादरियों में एकसमान रूप से दिखाई देती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों में से ऐसा विनम्र जाट जो सबको साथ लेकर चलने की कूबत रखता है, ऐसा व्यक्ति होना चाहिए। वैश्य बिरादरी का अध्यक्ष भी सफल हो सकता है और उतना ही उचित ओबीसी वर्ग रहेगा। देखना है कि भाजपा क्या फैसला करती है और उसके क्या नतीजे सामने आते हैं। बहरहाल मनमानी या किसी के जेब का व्यक्ति यदि अध्यक्ष बनाया जाता है तो भाजपा के सामने जोखिम कम होने के बजाए बढ़ेंगे और उससे 2027 का खेल भी बिगड़ेगा।
राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
