शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (509) गतांक से आगे......

इन्द्र द्वारा काम का स्मरण, उसके साथ उनकी बातचीत तथा उनके कहने से काम का शिव को मोहने के लिए प्रस्थान

मित्रवर! उसके हो जाने से हम देवताओं को बड़ा सुख मिलेगा। भगवान् शम्भु गिरिराज हिमालय पर उत्तम तपस्या में लगे हैं। वे हमारे भी प्रभु हैं, कामना के वश में नहीं हैं, स्वतंत्र परमेश्वर हैं। 

मैंने सुना है कि गिरिराजनन्दिनी पार्वती पिता की आज्ञा पाकर अपनी दो सखियों के साथ उनके समीप रहकर उनकी सेवा में रहती हैं। उनका यह प्रयत्न महादेवजी को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ही है। परंतु भगवान् शिव अपने मन को संयम-नियम से वश में रखते हैं। मार! जिस तरह भी उनकी पार्वती में अत्यन्त रूचि हो जाये, तुम्हें वैसा ही प्रयत्न करना चाहिए। यही कार्य करके तुम कृतार्थ जो जाओगे और हमारा सारा दुःख नष्ट हो जायेगा। इतना ही नहीं, लोक में तुम्हारा स्थायी प्रताप फैल जायेगा। 

ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! इन्द्र के ऐसा कहने पर कामदेव का मुखारविन्द प्रसन्नता से खिल उठा। उसने देवराज से प्रेमपूर्वक कहा-मैं इस कार्य को करूंगा। इसमं संशय नहीं है। ऐसा कहकर शिव की माया से मोहित हुए काम ने उस कार्य के लिए स्वीकृति दे दी और शीघ्र ही उसका भार ले लिया। वह अपनी पत्नी रति और वसन्त को साथ ले बड़ी प्रसन्नता के साथ उस स्थान पर गया, जहां साक्षात् योगीश्वर शिव उत्तम तपस्या कर रहे थे।  (अध्याय 17)                                                                                                                                  (शेष आगामी अंक में)

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