इन्द्र द्वारा काम का स्मरण, उसके साथ उनकी बातचीत तथा उनके कहने से काम का शिव को मोहने के लिए प्रस्थान
जो काम जिससे पूरा हो सके, बुद्धिमान् पुरूष उसे उसी काम लगायें। मेरे योग्य जो कार्य हो, वह सब आप मेरे जिम्मे कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं-कामदेव का यह कथन सुनकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। वे कामिनियों को सुख देने वाले काम को प्रणाम करके उससे इस प्रकार बोले।
इन्द्र ने कहा-तात! मनोभव! मैंने अपने मन में जिस कार्य को पूर्ण करने का उद्देश्य रखा है, उसे सिद्ध करने में केवल तुम्हीं समर्थ हो। दूसरे किसी से उस कार्य का होना सम्भव नहीं है। मित्रवर! मनोभव काम! जिसके लिये आज तुम्हारे सहयोग की अपेक्षा हुई है, उसे ठीक-ठाक बता रहा हूं, सुनो। तारक नाम से प्रसिद्ध जो महान दैत्य है, वह ब्रह्माजी का अद्भुत वर पाकर अजेय हो गया है और सभी को दुःख दे रहा है। वह सारे संसार को पीड़ा दे रहा है। उसके द्वारा बारंबार धर्म का नाश हुआ है। उससे सब देवता और समस्त ट्टषि दुखी हुए हैं। सम्पूर्ण देवताओं ने पहले उसके साथ अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध किया था, परन्तु उसके ऊपर सबके अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो गये। जल के स्वामी वरण का पाश टूट गया। श्रीहरि का सुदर्शनचक्र भी वहां सफल नहीं हुआ। श्रीविष्णु ने उसके कण्ठ पर चक्र चलाया, किन्तु वह वहां कुंठित हो गया। ब्रह्माजी ने महायोेगश्वर भगवान् के वीर्य के उत्पन्न हुए बालक के हाथ से इस दुरात्मा दैत्य की मृत्यु बतायी है। यह कार्य तुम्हें अच्छी तरह और प्रयत्नपूर्वक करना है। (शेष आगामी अंक में)
