पुस्तकालय की उपादेयता

डॉ. अवधेश कुमार "अवध", शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

पुस्तक को सबसे अच्छा गुरु माना जाता है जो पढ़ने वाले को बिना सजा दिए बहुत कुछ अनवरत सिखाती है। जब पुस्तक के घर (पुस्तक + आलय) की बात हो तो उसे पुस्तकालय कहते हैं। आंग्लभाषा में लाइब्रेरी का भी यही आशय है। किसी विद्वान का यह कथन भी यहाँ प्रासंगिक है कि किसी घर की समृद्धि उसके पुस्तकालय में निहित होती है। जितना बड़ा और विविध पुस्तकों से सजा पुस्तकालय होगा, उस घर को उतना ही अधिक समृद्ध माना जाना चाहिए। किसी के घर जाते ही हमारी पहली नज़र पुस्तकालय को तलाशने लगे और बिना देर किए पुस्तकालय पर नज़र ठहर जाये तो समझिए कि मेहमानी और मेजबानी दोनों सफल हुई। पुस्तकालय समाजीकरण हेतु भी बहुत प्रासंगिक है और व्यक्तित्व निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण।

पुस्तकालय की पहुँच इतनी व्यापक है कि यह अधिकांश घरों में, लगभग हर कार्यालयों में, प्रायः हर छोटे-बड़े शहरों में, हर शिक्षण संस्थानों में तथा दुनिया के हर देशों में अवस्थित है। जहाँ ज्ञान है, वहीं पुस्तकालय है। जहाँ पुस्तकालय है, वहाँ जिज्ञासुओं का आना स्वाभाविक है। यह वैसे ही सम्भव है जैसे चीनी के पास चींटी। उपलब्ध पुस्तकों के कालखंड, पुस्तकों की संख्या, विविधता, पाठकों की संख्या और व्यवस्थापन के आधार पर पुस्तकालय कई तरह के हो सकते हैं किंतु सबका उद्देश्य एक जैसा ही होता है।

आज चीन के सबसे बड़े पुस्तकालय में पाँच करोड़ पुस्तकें हैं तो अमेरिका के सबसे बड़े पुस्तकालय में साढ़े तीन करोड़। आबादी में नम्बर एक देश चीन को टक्कर देने वाला भारत पुस्तकालय में पुस्तकों की संख्या  में बहुत पीछे रह गया तभी तो साक्षरता भी कम है हमारी। सर्व प्रथम दुनिया को ज्ञान की रौशनी से परिचित कराने वाला भारत ही था। अज्ञान के क्षितिज पर ज्ञान का दीपक हमने ही जलाए थे। हमारे प्राचीन विश्वविद्यालय और उसमें स्थापित पुस्तकालय इसके प्रमाण हैं। तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय में अवस्थित सबसे पुराने और विशालतम पुस्तकालय को पहले लूटा गया, फिर विकृत किया गया तत्पश्चात जलाया गया। हमारे पुस्तकालयों को लूटने वाले आज बड़े पुस्तकालयों के निर्माता हो गए, संचालक हो गए, स्वामी हो गए। इतिहास साक्षी है कि भारत से उपहार स्वरूप पुस्तकें चीन ले गया था जो आज दुनिया के सबसे समृद्ध पुस्तकालय का संचालक है।

पुस्तकालय को कदापि पुस्तकों का भंडार या पुस्तकों की दुकान न समझें। दुकान का उद्देश्य सामान बेचना होता है जिसपर माँग-पूर्ति के नियम प्रायः लागू होते हैं। अधिकाधिक लाभ के उदेश्य से दुकान की स्थापना एवं क्रियान्वयन होता है। पुस्तकालय का उद्देश्य व कार्य व्यवहार इसके विपरीत होता है। इसी तरह भंडार का उद्देश्य भी अत्यंत सीमित होता है। सामान के रख-रखाव एवं आवागमन से अधिक यह कुछ भी नहीं होता। अतएव पुस्तकालय इन सबसे भिन्न है। ज्ञान का संरक्षण, ज्ञान हस्तांतरण और ज्ञानांतराल में सेतु का महनीय कार्य पुस्तकालय द्वारा ही किया जाता है। इसके अभाव में चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा.....।

वर्तमान संदर्भ में पुस्तकालय मूलरूप से दो तरह के पाए जाते हैं। एक भौतिक पुस्तकालय और दूसरा ई पुस्तकालय। भौतिक पुस्तकालय वह पुस्तकालय है जो हजार वर्षों से क्रमोत्तर विकास करता हुआ चला आ रहा है। इसमें स्थान, भवन, कर्मचारी, रखरखाव, पुस्तकों का लेखा-जोखा, पाठन हेतु सुविधाएँ आदि व्यवस्थित तरीके से की जाती हैं। आधुनिकता ने इसके लेखा-जोखा को कम्युपरीकृत कर दिया है जिससे पल भर में पाठक मनचाही पुस्तक तक अपनी पहुँच बना सकता है। किसी विषय पर समस्त उपलब्ध पुस्तकों की सूची देख सकता है। बिना देर किए पुस्तकालय संबंधी समस्त जानकारी पाठक ले सकता है।

अब ई पुस्तकालय का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इसमें पुस्तकों को भौतिक रूप से नहीं अपितु आधुनिक तकनीक से पठनीय पीडीएफ के रूप में क्रमबद्ध तरीके से संकलित किया जाता है। सोशल मीडिया के विभिन्न स्रोतों द्वारा भी पाठक, ई पुस्तकालय से सम्बद्ध हो सकता है। पाठक यहाँ आकर या कहीं से भी कम्प्यूटर की सहायता से कभी भी ऐच्छिक पुस्तक पढ़ सकता है। उक्त पुस्तकालय में किसी भी विषय पर उपलब्ध पुस्तकों से परिचित होकर संतुष्ट हो सकता है। ई पुस्तकालय का समाज में चलन इतना तेज है कि निकट भविष्य में इसके प्रभाव से कोई अछूता नहीं रह सकेगा।

चूँकि मानव मन और मस्तिष्क सतत गतिशील है इसलिए जिज्ञासा और ज्ञान भी अनवरत चलायमान है। जिज्ञासा और ज्ञान के संरक्षण, हस्तांतरण और नवीन खोज के लिए पुस्तकालय ही एक मात्र उपाय है। अतएव बढ़ते बाजारीकरण और गिरते सामाजिक मूल्य के दौर में पुस्त और पुस्तकालय की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है। आइए, इसमें योगदान करते हुए नवीन भारत का स्वागत करें।

मैक्स सीमेंट, ईस्ट जयन्तिया हिल्स मेघालय

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