पार्वती की तपस्या विषयक दृढ़ता, उनका पहले से भी उग्र तप, उससे त्रिलोकी का संतप्त होना तथा समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा और विष्णु का भगवान् शिव के स्थान पर जाना
इस समय विश्व में जो दाह उत्पन्न हो गया है, वह गिरिजा की तपस्या का फल है-यह जानकर मैं उन सबके साथ शीघ्र ही क्षीरसागर को गया। वहां जाने का उद्देश्य भगवान् विष्णु से सबकुछ बतान था। वहां पहुंचकर देखा, भगवान् श्रीहरि सुखद आसन पर विराजमान हैं। देवताओं के साथ मैंने हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक उनकी स्तुति की और कहा- महाविष्णो! तपस्या में लगी हुई पार्वती के परम उग्र तप से संतप्त हो हम सब लोग आपकी शरण में आये हैं। आप हमें बचाईये, बचाईये। हम सब देवताओं की यह बात सुनकर शेषशया पर बैठे हुए भगवान् लक्ष्मीपति हमसे बोले-
श्री विष्णु ने कहा- देवताओं! मैंने आज पार्वती जी की तपस्या का सारा कारण जान लिया है। अतः तुम लोगों के साथ अब परमेश्वर शिव के समीप चलता हूं। हम सब लोग मिलकर यह प्रार्थना करेंगे कि वे गिरिजा को ब्याहकर अपने यहां ले आवें। अमरो! इस समय समस्त संसार के कल्याण के लिए भगवान् से शिवा के पाणिग्रहण के लिए अनुरोध करना है। देवाधिदेव पिनाकधारी भगवान् शिव शिवा को वर देने के लिए जैसे भी वहीं उनके आश्रम पर जायें, इस समय हम वैसा ही प्रयत्न करेंगे। अतः परम मंगलमय महाप्रभु रूद्र जहां उग्र तपस्या में लगे हुए हैं, वहीं हम सब लोग चलें। भगवान् विष्णु की यह बात सुनकर समस्त देवता आदि हठी, क्रोधी और जलाने के लिए उद्यत रहने वाले प्रलयंकारी रूद्र से अत्यन्त भयभीत हो बोले। (शेष आगामी अंक में)
