एडवोकेट अलप भाई पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
भारत की स्वतंत्रता को लगभग आठ दशक बीत चुके हैं, लेकिन एक प्रश्न आज भी समय-समय पर उठता है—क्या केवल सत्ता का हस्तांतरण हुआ था या वास्तव में शासन व्यवस्था का भारतीयकरण भी हुआ? यह प्रश्न विशेष रूप से तब प्रासंगिक हो जाता है जब हम शिक्षा, प्रशासन, कानून और आर्थिक ढांचे को औपनिवेशिक विरासत के संदर्भ में देखते हैं।
अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत का सामाजिक और आर्थिक ढांचा स्थानीय आवश्यकताओं पर आधारित था। देश के विभिन्न भागों में राजा, महाराजा और रियासतें शासन करती थीं। आम जन का जीवन कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यवसायों पर निर्भर था। व्यक्ति का संबंध अपने परिवार, गांव, खेत और स्थानीय समाज से गहराई से जुड़ा हुआ था। जीवन का अधिकांश हिस्सा स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक व्यवस्थाओं के भीतर संचालित होता था।
अंग्रेज जब भारत आए तो उनका उद्देश्य भारतीय समाज का विकास नहीं, बल्कि व्यापार और आर्थिक लाभ प्राप्त करना था। धीरे-धीरे उन्होंने भारतीय रियासतों के बीच मौजूद मतभेदों का लाभ उठाकर राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया। इसके बाद भारत की प्राकृतिक संपदा, कच्चे माल और विशाल श्रमशक्ति को औपनिवेशिक हितों के अनुरूप संगठित किया गया। इतिहासकारो के अनुसार औपनिवेशिक शासन की अनेक नीतियां ब्रिटिश साम्राज्य की प्रशासनिक और आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं। इसी प्रक्रिया में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का विस्तार हुआ। यह निर्विवाद है कि अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में नए अवसर पैदा किए, लेकिन यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि औपनिवेशिक शिक्षा नीति का एक प्रमुख उद्देश्य ऐसे लोगों का वर्ग तैयार करना था जो शासन और प्रशासन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सके। थॉमस मैकॉले के शिक्षा संबंधी विचारों की चर्चा आज भी इसी संदर्भ में की जाती है।
एक विचारधारा मानती है कि शिक्षा और नौकरी आधारित आधुनिक व्यवस्था ने व्यक्ति को उसके पारंपरिक सामाजिक ढांचे से दूर कर दिया। रोजगार और करियर की तलाश में लाखों लोग अपने गांव, खेत, परिवार और स्थानीय समाज से दूर महानगरों की ओर जाने लगे। आर्थिक अवसर बढ़े, लेकिन इसके साथ ही संयुक्त परिवारों का विघटन, सामाजिक संबंधों में दूरी और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का क्षरण भी देखने को मिला। आज का युवा उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर रहने को विवश है। उसके लिए सफलता का अर्थ अक्सर अपने मूल परिवेश से दूर जाकर किसी बड़े शहर में बस जाना बन गया है। यह स्थिति केवल आर्थिक परिवर्तन का परिणाम नहीं है, बल्कि उस विकास मॉडल की भी देन है जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल में विकसित प्रशासनिक और आर्थिक संरचनाओं में खोजी जाती हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि आधुनिक शिक्षा या रोजगार व्यवस्था गलत है। प्रश्न यह है कि क्या हमारी वर्तमान व्यवस्था भारतीय समाज की मूल आवश्यकताओं, पारिवारिक संरचना और स्थानीय अर्थव्यवस्था के अनुरूप विकसित हुई है, अथवा वह अब भी उस औपनिवेशिक सोच का विस्तार है जिसे कभी साम्राज्यवादी हितों के लिए बनाया गया था? यह बहस आज भी जारी है। कुछ विद्वान औपनिवेशिक शिक्षा को आधुनिक भारत के निर्माण का आधार मानते हैं, जबकि मैं इसे ऐसी व्यवस्था के रूप में देखता हूं जिसने भारतीय समाज को उसकी जड़ों से दूर कर दिया। स्वतंत्र भारत के सामने वास्तविक चुनौती केवल औपनिवेशिक शासन से मुक्ति प्राप्त करना नहीं थी, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता और संरचनाओं की समीक्षा करना भी थी। यदि शिक्षा, कानून और प्रशासन वास्तव में भारतीय समाज के हित में हैं तो उन्हें भारतीय परिस्थितियों, स्थानीय आवश्यकताओं और सांस्कृतिक वास्तविकताओं के अनुरूप निरंतर विकसित होना चाहिए।
आज आवश्यकता अतीत को लेकर भावनात्मक विवाद खड़ा करने की नहीं, बल्कि इस गंभीर प्रश्न पर विचार करने की है कि क्या हमारी शिक्षा और विकास व्यवस्था व्यक्ति को उसके परिवार, समाज और संस्कृति से जोड़ रही है या उससे दूर कर रही है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि विकास की प्रक्रिया में उसके सामाजिक संबंध, सांस्कृतिक पहचान और मानवीय मूल्य कितने सुरक्षित रह पाते हैं।
लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रयागराज में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं
