शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (536) गतांक से आगे......

पार्वती की तपस्या विषयक दृढ़ता, उनका पहले से भी उग्र तप, उससे त्रिलोकी का संतप्त होना तथा समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा और विष्णु का भगवान् शिव के स्थान पर जाना 

सुमधुर भाषण करने वाली पर्वतराजकुमारी शिवा माता मेनका, भाई मैनाक, पिता हिमालय और मन्दराचल आदि से उपर्युक्त बात कहकर शीघ्र ही चुप हो गयीं। शिवा के ऐसा कहने पर वे चतुर-चालाक पर्वत, गिरिराज सुमेरू आदि गिरिजा की बारंबार प्रशंसा करते हुए अत्यन्त विस्मित हो जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये। उन सबके चले जाने पर सखियों से घिरी हुई पार्वती मन में यथार्थ निश्चय करके पहले से भी अधिक उग्र तपस्या करने लगीं। मुनिश्रेष्ठ! देवताओं, असुरों, मनुष्यों और चराचर प्राणियों सहित समस्त त्रिलोकी उस महती तपस्या से संतप्त हो उठी। उस समय समस्त देवता, असुर, यक्ष, किंनर, चारण, सिद्ध, साध्य, मुनि, विद्याधर, बड़े-बड़े नाग, प्रजापति, गुह्यक तथा अन्य लोग महान् से महान् कष्ट में पड़ गये। परंतु इसका कोई कारण उनकी समझ में नहीं आया। तब इन्द्र आदि सब देवता मिलकर गुरू बृहस्पति से सलाह ले बड़ी विह्नलता के साथ सुमेरू पर्वत पर मुझ विधाता की शरण में आये। उस समय उनके सारे अंग संतप्त हो रहे थे। वहां आकर मुझे प्रणाम कर उन सभी व्याकुल और कांन्तिहीन देवताओं ने मेरी स्तुति करके एक साथ ही मुझसे पूछा-प्रभो! जगत् के संतप्त होने का क्या कारण है? 

उनका यह प्रश्न सुनकर मन-ही-मन शिव का स्मरण करके विचारपूर्वक मैंने सब कुछ जान लिया।                                                                                                                                                        (शेष आगामी अंक में)

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