हिन्दुस्तान फीचर, लखनऊ। प्रभु श्रीराम पर अगाध विश्वास रखने वाले वयोवृद्ध चम्पत राय शान्त हैं, धीरज धारण किये हुए प्रभु की शरण में स्थित रहते हुए समय का इंतजार कर रहे हैं। ईश्वर में आस्था रखने वाले चम्पत राय ने अपनी युवावस्था में एक सपना देखा था अपने प्रभु श्रीराम के लिए मंदिर बनाने का उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी सपने को यथार्थ में परिवर्तित होते हुए देखने में व्यतीत कर दिया। संघ के कठोर नियमों का पालन करते हुए अनुशासन में रहना उन्होंने सायास सीखा था, जिसका उन्होंने अब तक कड़ाई से पालन किया। अयोध्या विवाद से सम्बन्धित ऐतिहासिक राजस्व अभिलेखों, कानूनी अभिलेखों तथा भूूमि के मानचित्रों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण उन्होंने ही किया। कोर्ट में प्रभु श्रीराम जी के मुकदमों में अभिलेखीय तमाम कागजात वकीलों को उपलब्ध कराने का कार्य उन्होंने नेपथ्य में रहकर किया। इस कठिन जिम्मेदारी को निभाना आसान नहीं था, लेकिन चम्पत राय ने हमेशा की तरह सभी को आश्वस्त करते हुए अपनी इस भूमिका को भी बखूबी निभाया। रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की देखभाल, वहां आने वाले पर्यटकों के लिए प्रभु श्रीराम के दर्शन की, प्रसाद की व्यवस्थाओं पर नजर रखना सब कुछ तो चम्पत राय लगन और समर्पण से कर रहे थे। जब उन्हें चोरी का पता चला तो वे उसके लिए भी पता कर ही रहे थे कि तभी एक शीर्ष अधिकारी के बयान ने सबको अचम्भित कर दिया। चोरी नहीं लूट हुई है। अचानक हर अनियमितता, अव्यवस्था और लूट का ठीकरा चम्पत राय पर मढ़ कर उन्हें ट्रस्ट से बाहर करने की योजना बनाकर आनन-फानन में उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया गया। इस्तीफे से सम्बन्धित कुछ बिन्दुओं पर विचार करना अति आवश्यक है-
पहले तो चोरी का पता लगते ही जब मुख्यमंत्री ने अविलम्ब एसआईटी गठित करके जांच प्रारम्भ कर दी थी, अभी एसआईटी की रिपोर्ट भी नहीं आई थी और उससे पहले ही इस्तीफा मंजूर क्यों कर लिया गया? एसआईटी की रिपोट्र आने का इंतजार क्यों नहीं किया? दूसरे ट्रस्ट द्वारा यह बताया कि ट्रस्ट के नियमों के अनुसार इस्तीफा दे दिया गया था तो उसे मंजूर करना ट्रस्ट की मजबूरी थी। इस्तीफे दिये जाते हैं, मंजूर और नामंजूर दोनों हो सकते हैं।। यहां क्यों बाध्य थे इस्तीफा मंजूर करने के लिए? जबकि अधिकांश ट्रस्टी इस्तीफा मंजूर करने के पक्ष में नहीं थे। करीबी लोगों का तो यहां तक कहना है कि चम्पत ने इस्तीफा दिया ही नहीं है और यदि गया था तो उसे पहले ही सार्वजनिक करना चाहिए था। क्या इस घटना की पटकथा दूर कहीं बहुत दूर और बहुत पहले ही लिखी जा चुकी थी। इस्तीफा मंजूर करने वाले यह कैसे भूल गये कि इसी विरक्त संत की निस्वार्थ तपस्या का प्रतिफल है यह भव्य दिव्य राम मंदिर। मंदिर निर्माण की कानूनी लम्बी लड़ाई लड़ने वाले यही चम्पत राय थे जिन्होंने किसी की परवाह किये बिना एक लम्बे और कठिन संघर्ष के बाद जीत हासिल की थी। इस मंदिर की एक-एक ईंट पर इस संत के हस्ताक्षर हैं जो दिखाई तो नहीं देते पर महसूस जरूर होते हैं और इनके संघर्ष की कहानी कहते रहते हैं।
मंदिर में प्रवेश करते प्रत्येक रामभक्त को वह समय भी याद आता है जब रामलला टेंट में थे। तब यही रामलला के पटवारी चम्पत राय अपनी जान की परवाह किये बिना अदालतों के चक्कर लगा रहे थे। उन्होंने देश के बड़े वकीलों को अकाट्य सबूत सौंपे, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर की जीत की बुनियाद रखी। अपनी युवावस्था के 40 वर्ष उन्होंने अपने रामलला को भव्य मंदिर में विराजमान कराने के अपने सपने को जीते हुए व्यतीत कर दिये। वे अपने प्रभु के साथ ही जीते रहे उनका अपना निजी कुछ भी नहीं था। ऐसे व्यक्ति पर चोरी डकैती के अनर्गल आरोप लगाकर इस्तीफा ले लिया गया। क्या यह न्याससंगत है? तमाम राम भक्त आज यह सवाल पूछ रहे हैं और उसके पीछे के कारण भी जानना चाहते हैं। चम्पत राय ने तो कह दिया कि मेरी सेवा पूरी हो गई। लेकिन क्या उनका अन्तर्मन भीतर ही भीतर नहीं रो रहा होगा। सम्पूर्ण जीवन की निस्वार्थ, त्याग और तपस्या का यह कैसा प्रतिफल है प्रभु।
यहां एक प्रश्न और उठता है कि हमारे शासन-प्रशासन को अपने आस-पास ईमानदार, विद्वान, शिक्षित, निर्लोभी लोग नहीं चाहिए क्या? क्यों हमारे सभी संस्थान निस्वार्थ तपस्वी संतों से विहिन होते जा रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि चम्पत राय अपनी ईमानदार छवि के कारण शीर्षस्थों के मार्ग में रोड़ा बन रहे थे। चम्पत राय शांत हैं और हैं उनका साथ देने वाले इस स्वार्थी दुनिया में भी बहुत से लोग हैं, जो खुलकर बोल रहे हैं, जिसमें सम्पूर्ण देश-विदेश तथा अयोध्या के साधु संत भी शामिल हैं, लेकिन शासन-प्रशासन उन्हें भी अनसुना कर रहा है, पर उन्हें विश्वास है उनके राम जी उनके साथ हैं। उन्हांेने रामभक्तों के नाम एक पत्र सार्वजनिक किया है, जिसमें उन्होंने कहा है- पिछले 7 जून 2026 से श्री रामजन्मभूमि मंदिर परिसर के दान पात्र की गणना के समय की गई चोरी के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की चर्चाएं चल रही हैं। व्यक्तिगत मेरे ऊपर अनेक लोगों ने अनर्गल आरोप लगाए हैं, मैंने मौन धारण कर लिया है, मंदिर ट्रस्ट की 6 जुलाई को सम्पन्न बैठक में एसआईटी की प्रारम्भिक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, यह रिपोर्ट अब सार्वजनिक हो गई है, यद्यपि यह परम गोपनीय थी। आप सबको मैं आश्वस्त करता हूं कि एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद फैलाये जा रहे सभी बिन्दुओं पर अपना उत्तर क्रमानुसार दूंगा। सभी सत्य सामने आ जायेगा। मैं वर्ष अक्टूबर 1991 से अयोध्या भेजा गया संगठन द्वारा। मेरा प्रचारक जीवन 45 वर्ष से, जहां-जहां मैं रहा, खुली पुस्तक के समान है। सभी को आदर पूर्वक नमन।
इसके अतिरिक्त श्री रामजन्मभूमि क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव रहे चम्पत राय ने अपने मौन को तोड़ते हुए एसबीआई और ट्रस्ट के सदस्य रहे अनिल मिश्रा को इस चोरी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। एसआईटी को भेजे गए पत्र में उन्होंने दान की गणना प्रक्रिया से जुड़े कई बिन्दुओं पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे बैंक और ट्रस्ट के संयुक्त रूप से निर्धारित दिशा-निर्देशों से वे पूरी तरह से असहमत हैं। इस दस्तावेज पर ट्रस्टी अनिल मिश्रा और बैंक के प्रबन्धक के हस्ताक्षर हैं। उन्होंने कहा कि अगस्त 2020 से इस साल जून तक ट्रस्ट और अन्य संस्थाओं के बीच हुए सभी महत्वपूर्ण अनुबंधों पर उनके हस्ताक्षर हैं तो फिर किसी खास दस्तावेज पर चम्पत जी के हस्ताक्षर न कराना अनेक सवाल खड़े करता है। यदि वे बाहर थे तो भी उनकी प्रतीक्षा की आनी चाहिए थी।
इस समस्त प्रकरण को देखने से यह तो संदेह पैदा होता ही है कि जो रिपोर्ट अति गोपनीय थी वह इतनी जल्दी सार्वजनिक क्यों की गई। क्या इसका भी कोई खास मकसद था। ऐसी चीजें संदेह उत्पन्न करती है और राम जी के पटवारी को हटाना हमारे हिन्दू समाज के लिए एक शर्मनाक स्थिति है। हम अपने नैतिक बल पर ही अतुल्य भारत कहलाते थे। आज हमारे उस नैतिक बल को ही तोड़ा जा रहा है।