श्री शिव की आराधना के लिए पार्वती जी की दुष्कर तपस्या
तदनन्तर हिमवान् की पुत्री शिवा देवी पत्ते खाना भी छोड़कर सर्वथा निराहार रहने लगीं, तो भी तपश्चर्या में उनका अनुराग बढ़ता ही गया। हिमाचल पुत्री शिवा ने भोजन के लिए पर्ण का भी परित्याग कर दिया। इसलिए देवताओं ने उनका नाम अपर्णा रख दिया। इसके बाद पार्वती भगवान् शिव के स्मरणपूर्वक एक पैर से खड़ी हो पंचाक्षर मंत्र का जप करती हुई बड़ी भारी तपस्या करनी लगीं। उनके अंगचीर और वल्कल से ढके थे। वे मस्तक पर जटाओं का समूह धारण किये रहती थीं। इस प्रकार शिव के चिंतन में लगी हुई पार्वती ने अपनी तपस्या के द्वारा मुनियों को जीत लिया। उस तपोवन में महेश्वर के चिन्तनपूर्वक तपस्या करती हुई काली के तीन हजार वर्ष बीत गये।
तदनन्तर जहां महादेवजी ने साठ हजार वर्षों तक तप किया था, उस स्थान पर क्षणभर ठहरकर शिवा देवी इस प्रकार चिन्ता करने लगीं- क्या महादेवजी इस समय यह नहीं जानते कि मैं उनके लिए नियमों के पालन में तत्पर हो तपस्या कर रही हूं? फिर क्या कारएा है कि सुदीर्घकाल से तपस्या में लगी हुई मुझ सेविका के पास वे नहीं आये? लोक में, वेद में और मुनियों द्वारा सदा गिरीश की महिमा का गान किया जाता है। सब यही कहते हैं कि भगवान् शंकर सर्वज्ञ, सर्वात्मा, सर्वदर्शी, समस्त ऐश्वर्यों के दाता, दिव्य शक्तिसम्पन्न, सबके मनोभावों को समझ लेने वाले, भक्तों को उनकी अभीष्ट वस्तु देने वाले और सदा समस्त क्लेशों का निवारण करने वाले हैं। यदि मैं समस्त कामनाओं का परित्याग करके भगवान् वृषध्वज में अनुरक्त हुई हूं, तो (शेष आगामी अंक में)
