ब्रह्माजी का शिव की क्रोधग्नि को वडवानल की संज्ञा दे समुद्र में स्थापित करके संसार के भय को दूर करना, शिव के विरह से पार्वती का शोक तथा नारदजी के द्वारा उन्हें तपस्या के लिए उपदेशपूर्वक पंचाक्षर मंत्र की प्राप्ति
वे सोते-जागते, खाते-पीते, नहाते-धोते, चलते-फिरते और सखियों के बीच में खड़े होते समय भी कभी किंचितमात्र भी सुख का अनुभव नहीं करती थीं। मेरे स्वरूप को तथा जन्म-कर्म को भी धिक्कार है, ऐसा कहती हुई वे सदा महादेवजी की प्रत्येक चेष्टा का चिन्तन करती थीं। इस प्रकार पार्वती भगवान् शिव के विरह से मन ही मन अत्यन्त क्लेश का अनुभव करती और किंचितमात्र भी सुख नहीं पाती थीं। वे सदा शिव, शिव का जाप किया करती थीं। शरीर से पिता के घर में रहकर भी वे चित्त से पिनाकमणि भगवान् शंकर के पास पहुंचती रहती थीं। तात! शिवा शोकमग्न हो बारंबार मुर्छित हो जाती थीं। शैलराज हिमवान् उनकी पत्नी मेनका तथा उनके मैनाक आदि सभी पुत्र, जो बड़े उदारचेता थे, उन्हें सदा सांत्वना देते रहते थे। तथापि वे भगवान् शंकर को भूल न सकीं।
बुद्धिमान देवर्षे! तदनन्तर एक दिन इन्द्र की प्रेरणा से इच्छानुसार घूमते हुए तुम हिमालय पर्वत पर आये। उस समय महात्मा हिमवान् ने तुम्हारा स्वागत-सत्कार किया और कुशल -मंगल पूछा। फिर तुम उनके दिये हुए उत्तम आसन पर बैठे। तदनन्तर शैलराज ने अपनी कन्या के चरित्र का आरम्भ से वर्णन किया। (शेष आगामी अंक में)
