आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व न्याय: वरदान को अभिशाप मत बनाइए

के सी जैन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग को लेकर एक विस्तृत नीति जारी की है। इस नीति का शीर्षक है — “Policy on Use of Artificial Intelligence in Judicial and Court Administration.” इस नीति में AI को प्रशासनिक कार्यों जैसे दस्तावेज़ अनुवाद, व्याकरण जाँच और तारीखों की सूची बनाने की अनुमति दी गई है, परंतु न्यायिक निर्णय, तर्क, सबूतों का मूल्यांकन, जमानत, सज़ा और अंतिम फैसलों में AI के उपयोग पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया गया है। नीति का उल्लंघन करने पर संबंधित न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्याय का आधार मानवीय विवेक और संवैधानिक मूल्य होने चाहिए तथा किसी भी AI-जनित आउटपुट को एक योग्य मानव अधिकारी द्वारा जाँचा और सत्यापित किया जाना अनिवार्य है।
हाई कोर्ट की यह चिंता निःसंदेह सराहनीय है कि न्यायिक फैसला एक संवेदनशील इंसान द्वारा ही होना चाहिए। परंतु इस नीति पर और गहराई से विचार किए जाने की आवश्यकता है। आज भारत में पाँच करोड़ से भी अधिक मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट में अस्सी हज़ार से अधिक, हाई कोर्ट में साठ लाख से अधिक और ज़िला अदालतों में चार करोड़ से अधिक मामले वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा में हैं। एक सामान्य मुकदमे को निपटाने में दस से बीस वर्ष तक का समय लग जाता है। ऐसे में एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए न्याय पाना किसी सपने से कम नहीं रह जाता। यह स्थिति उस महान न्यायिक सिद्धांत को चुनौती देती है जो कहता है — “न्याय में देरी, न्याय का इनकार है।
ऐसे गंभीर संकट के समय में AI एक अत्यंत उपयोगी और शक्तिशाली साधन बनकर सामने आया है। AI पुराने फैसलों और केस लॉ को तुरंत खोज सकता है, कानून की सुसंगत धाराएँ बता सकता है, केस का तथ्यात्मक सारांश तैयार कर सकता है, तारीखों का प्रबंधन कर सकता है और मोटी-मोटी फाइलों को संक्षिप्त रूप में जज के सामने प्रस्तुत कर सकता है। इससे जज का बहुमूल्य समय बचेगा और वे अधिक मामलों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। इसे एक सरल उदाहरण से समझिए — जैसे एक कुशल डॉक्टर X-Ray मशीन और पैथोलॉजी रिपोर्ट की मदद लेता है, परंतु इलाज का अंतिम निर्णय वह स्वयं अपने विवेक और अनुभव से करता है। ठीक उसी प्रकार AI जज का सहायक बन सकता है — उनका बोझ हल्का कर सकता है, शोध कार्य में मदद कर सकता है — परंतु न्याय का अंतिम निर्णय सदैव जज का ही रहेगा।
AI को न्यायपालिका से पूरी तरह दूर रखने के बजाय उसे एक सुयोग्य, निगरानी युक्त और सीमित भूमिका में उपयोग किया जाए। AI को न्यायालय का डिजिटल मुंशी बनने दीजिए — जो फाइलें तैयार करे, कानून खोजे, तारीखें व्यवस्थित करे — और जज साहब निर्भय होकर पूरी एकाग्रता के साथ न्याय करें।
पाँच करोड़ लंबित मुकदमों के बोझ तले दबे इस देश में AI एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है — बशर्ते उसका उपयोग सोच-समझकर, पारदर्शिता के साथ और मानवीय निगरानी में किया जाए। न्याय को तीव्र, सुलभ और सस्ता बनाना ही इस देश के करोड़ों आम नागरिकों के प्रति हमारी सच्ची ज़िम्मेदारी है।
अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता आगरा, उत्तर प्रदेश 

Post a Comment

Previous Post Next Post