शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (514) गतांक से आगे......

रूद्र की नेत्राग्नि से काम का भस्म होना, रति का विलाप, देवताओं की प्रार्थना से शिव का काम को द्वापर में प्रद्युम्न रूप से नूतन शरीर की प्राप्ति के लिए वर देना और रति का शम्बर-नगर में जाना 

सब लोग अपनी-अपनी करनी का फल भोगते हैं। तुम देवताओं को दोष देकर व्यर्थ ही शोक करती हो। इस प्रकार रति को आश्वासन दे सब देवता भगवान् शिव के पास आये और उन्हें भक्तिभाव से प्रसन्न करके यों बोले।

देवताओं ने कहा- भगवन्! शरणागतवत्सल महेश्वर! आप कृपा करके हमारे इस शुभ वचन को सुनिये। शंकर! कामदेव की करतूत पर भलीभांति प्रसन्नतापूर्वक विचार कीजिये। महेश्वर! काम ने जो यह कार्य किया है, इसमें इसका कोई स्वार्थ नहीं था। दुष्ट तारकासुर से पीड़ित हुए हम देवताओं ने मिलकर उससे यह काम कराया है। नाथ! शंकर! इसे आप अन्यथा न समझें। सब कुछ देने वाले देव! गिरीश! सती-साध्वी रति अकेली अति दुखी होकर विलाप कर रही है। आप उसे सांत्वना प्रदान करें। शंकर! यदि इस क्रोध के द्वारा आपने कामदेव को मार डाला तो हम यही समझेंगे कि आप देवताओं सहित समस्त प्राणियों का अभी संहार कर डालना चाहते हैं। रति का दुख देखकर देवता नष्ट-प्राय हो रहे हैं। इसलिए आपको रति का शोक दूर कर देना चाहिए।

ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! सम्पूर्ण देवताओं का यह वचन सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न हो उनसे इस प्रकार बोले। शिव ने कहा- देवताओं और ट्टषियों। तुम सब आदरपूर्वक मेरी बात सुनो।                        (शेष आगामी अंक में)

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