हिमाचली पहाड़ी भाषा: पहचान, अस्तित्व और संवैधानिक अधिकार

उमा ठाकुर, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र

किसी भी राष्ट्र, समाज या प्रदेश की असली पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि उसकी भाषा और बोली से पहचानी जाती है। भाषा वह अदृश्य धागा है, जो पीढ़ियों को पीढ़ियों से जोड़ता है और जिसके बिना कोई भी समाज केवल भीड़ बनकर रह जाता है। जिस समाज की मातृभाषा जीवित रहती है, वही समाज समय के थपेड़ों के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है।  हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में यह सत्य और भी गहराई से उभरता है, क्योंकि यहाँ की पहाड़ी बोलियाँ ही हमारी सांस्कृतिक अस्मिता की मूल आधारशिला हैं।

भाषा का विकास सदैव बोलियों से ही हुआ है। संस्कृत से लेकर आधुनिक भारतीय भाषाओं तक, हर भाषा की जड़ें लोकबोलियों में निहित हैं। यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी अपनी भाव-अभिव्यक्ति के लिए जिन ध्वनियों का प्रयोग करते हैं, वे भी बोली की मूल अवधारणा को पुष्ट करती हैं। मानव सभ्यता के आरंभिक काल में जब लिपियाँ विकसित नहीं हुई थीं, तब बोली ही संवाद का एकमात्र साधन थी। इसी कारण हमें प्राचीन भाषाओं और बोलियों के प्रमाण शिलालेखों, ताम्रपत्रों, भोजपत्रों, स्तंभों और विविध प्राचीन लिपियों में मिलते हैं। हिमाचल की पहाड़ी भाषाएँ भी इसी दीर्घ सांस्कृतिक यात्रा की साक्षी हैं, जिनका उद्गम वैदिक परंपरा, सरस्वती-सिन्धु और सप्तसिन्धु सभ्यता से जुड़ा हुआ माना जाता है।
प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपने ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ में पहाड़ी भाषा को भारतीय आर्य भाषाओं की उपशाखा में रखते हुए ‘पश्चिमी पहाड़ी’ नाम दिया।उन्होंने भौगोलिक सिद्धान्तों के अनुसार पश्चिमी पहाड़ी के अन्तर्गत जौनसारी, सिरमौरी, क्योंथली,मण्डयाली,चम्बयाली बघाटी, कुल्लुई, भद्रवाही, सतलुज समूह आदि नौ भेद किए हैं।  सन् 1881 की जनगणना में भी हिमाचल क्षेत्र के लोगों ने अपनी मातृभाषा ‘पहाड़ी’ लिखवाई थी। यह तथ्य स्वयं इस बात का प्रमाण है कि पहाड़ी भाषा कोई नई या कृत्रिम अवधारणा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और स्वाभाविक भाषिक पहचान है।
डॉ. यशवंत सिंह परमार की 'हिमाचल प्रदेश क्षेत्र व भाषा' नामक पुस्तक में पहाड़ों में बोली जाने वाली बोलियों (उपभाषाओं) की संख्या 30 परिगणित है।हिमाचल के प्रख्यात भाषाविद् मौलूराम ठाकुर ने 'पहाड़ी व्याकरण' में जिन बोलियों या उपभाषाओं का वर्णन किया है- उनमें जौंसारी, सिरमौरी, कांगड़ी, मण्डयाली, चम्बयाली, कुल्लुई, बघाटी, क्योंथली, कहलूरी (बिलासपुरी) तथा भद्रवाही प्रसिद्ध हैं। हिमाचल के भाषाविद् कुमारसिंह सिसोदिया ने हिमाचल की बोलियों या उपभाषाओं को मध्य हिमाचली, उत्तरी क्षेत्र की उपभाषाएँ, पश्चिमी क्षेत्रीय उपभाषाएँ और  दक्षिण क्षेत्र की उपभाषाएँ इन चार विभागों के अन्तर्गत भाषा वैज्ञानिक आधार पर स्तरित किया है। इस स्तरीकरण में भाषा विज्ञान के आधार निहित हैं और बोलियों (उपभाषाओं) व इनकी लघु इकाईयों का विवरण भी समाहित है।  
हिमाचल के प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ.ओम प्रकाश शर्मा ने 'हिमाचली पहाड़ी भाषा लिपियाँ व लोक साहित्य' में पहाड़ी भाषा के स्वरूप एवं उदभव के साथ-साथ पहाड़ी भाषा की संवर्धक उपभाषाएँ (बोलियाँ), लिपयों व पहाड़ी लोक साहित्य का विस्तार से वर्णन किया है।   उनका मानना है कि पहाड़ी भाषा के वर्तमान भाषिक परिवेश में जौंसारी, सिरमौरी (गिरिवारी, गिरिपारी लघु इकाईयाँ), क्योंथली (बराड़ी, शौराचली, किरणी, कोची तथा सिरमौरी की बिशौई का सामूहिक स्वरूप (महासुई), बघाटी, कुल्लुई (बाह्य सराजी व कणाशी),चम्बयाली (चुराही, पंगवाली, गद्दी, भटयाली), मण्डयाली (चुराही, सगेती, भीतरी सराजी), कनावरी (थोशङ्, पौस्कन्द, शुभछोस्कन्द),लाहुली (बुनान, तिनान, मनचत, भोट-तिब्बती व चिनाली)  कहलूरी (बिलासपुरी) तथा कांगड़ी (उन्नयाली, हमीरपुरी) आदि इन बोलियों (उपभाषाओं) में ही पहाड़ी भाषा का स्वरूप विद्यमान है। इन्हीं बोलियों (उपभाषाओं) में आदिकाल काल से लोकसाहित्य रचा गया और वर्तमान साहित्य भी इन्हीं में रचा जा रहा है। यह बोलियाँ (उपभाषाएँ )केवल बोलचाल की भाषा नहीं हैं, बल्कि इनमें लोकगीत, लोकगाथाएँ, लोकनाट्य, कहावतें, लोकसुभाषित, धार्मिक आख्यान और सामाजिक मूल्य सुरक्षित हैं। यही कारण है कि कहा जाता है कि हिमाचल में बारह कोस पर बोली बदल जाती है, पर संस्कृति लगभग एक-सी रहती है। यह सांस्कृतिक एकता हिमाचल की सबसे बड़ी शक्ति है। तो क्या यह संभव नहीं कि इन बोलियों (उपभाषाओं)रूपी मणकों को एक माला में पिरोकर उन्हें 'हिमाचली पहाड़ी भाषा' का स्वरूप देकर संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल  करने का प्रयास किया जाए।

हिमाचल का गौरवशाली इतिहास केवल राजवंशों या युद्धों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सतत सांस्कृतिक विकास की गाथा है। नालागढ़, व्यास घाटी, वाणगंगा, कांगड़ा, सिरमौर की मार्कण्डा घाटी, बिलासपुर, रोपड़ घाटी और शिमला की पब्बर घाटी में मिले पुरातात्त्विक अवशेष सरस्वती-सिन्धु सभ्यता से हिमाचल के गहरे संबंधों को प्रमाणित करते हैं। पद्मचन्द्र कश्यप जैसे विद्वानों के शोध से यह स्पष्ट होता है कि हिमाचल की सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक जड़ें सप्तसिन्धु क्षेत्र से  जुड़ी हैं। ऐसे में पहाड़ी भाषा को केवल एक बोली कहकर उपेक्षित करना अपने ही इतिहास और विरासत से मुँह मोड़ने जैसा होगा। मातृबोली केवल संवाद का साधन नहीं, वह संस्कारों की वाहक होती है। जो बच्चा अपनी माँ बोली में सोचता है, उसकी जड़ें गहरी होती हैं। वह आधुनिकता को अपनाता है, पर अपनी पहचान नहीं खोता। यही संतुलन किसी भी समाज को जीवित रखता है।
हिमाचल के साहित्यकारों ने पहाड़ी भाषा को जीवित रखने में अपना जीवन समर्पित किया है। संतों से लेकर आधुनिक रचनाकारों तक, असंख्य लेखकों और कवियों ने अपनी-अपनी बोलियों में साहित्य रचकर इस भाषा की लौ जलाए रखी है। यह परंपरा आज भी जीवित है और यही पहाड़ी भाषा की सबसे बड़ी शक्ति है।

आज, जब हिमाचल प्रदेश अपना पूर्ण राज्यत्व दिवस मना रहा है, यह समय आत्मचिंतन और संकल्प का भी है। क्या यह विडंबना नहीं कि नेपाली, डोगरी और पंजाबी आदि भाषाएँ संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान पा चुकी हैं, परंतु 'हिमाचली पहाड़ी भाषा' अब भी प्रतीक्षा कर रही है? यह केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक अस्मिता, सम्मान और अधिकार का प्रश्न है। डिजिटल युग में इंटरनेट और सोशल मीडिया नई संभावनाएँ लेकर आए हैं। युवा वर्ग अपनी स्थानीय बोली में ब्लॉग, लेख, गीत और वीडियो बनाकर पहाड़ी भाषा को विश्व-पटल तक पहुँचा सकता है। भाषा एवं संस्कृति विभाग, कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी तथा आकाशवाणी के विभिन्न केंद्र इस दिशा में प्रयासरत हैं, परंतु यह संघर्ष तभी सफल होगा जब समाज, साहित्यकार, शिक्षाविद् और जनप्रतिनिधि एक स्वर में आगे आएँगे। आज आवश्यकता इस बात की है कि हिमाचली पहाड़ी भाषा को उसका संवैधानिक अधिकार मिले। विधानसभा में इस विषय पर ठोस पहल हो, शिक्षा में पहाड़ी भाषा को सम्मानजनक स्थान मिले और समाज स्तर पर इसे गर्व के साथ अपनाया जाए। यदि हम आज नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल शोध-ग्रंथों में यह खोजती फिरेंगी कि उनके पूर्वज किस बोली में अपने मनोभाव व्यक्त करते थे।
आइए! पूर्ण राजत्व दिवस के अवसर पर  हम सब यह संकल्प लें कि हिमाचली पहाड़ी भाषा को केवल भावनात्मक नहीं, संवैधानिक सम्मान भी दिलाएँगे। क्योंकि जब भाषा बचेगी, तभी संस्कृति बचेगी और जब संस्कृति बचेगी, तभी भावी पीढ़ी के लिए सदियों तक हिमाचल की असली शान कायम रहेगी।

लेखिका व सांस्कृतिक शोध कर्ता  शिमला हिमाचल प्रदेश

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