अखिलेश के पीडीए फार्मूले की काट साबित होंगे पूर्वांचल के कुर्मी नेता पंकज चौधरी

सुरेंद्र सिंघल, सहारनपुर। भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर उपयुक्त और दमदार व्यक्ति का चयन करने में बहुत लंबा और अखरने वाला समय लगा। लेकिन बहुत सोच-समझकर केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री 61 वर्षीय और सात बार के महाराजगंज से लोकसभा सदस्य पंकज चौधरी पर गहन विचार-विमर्श करने के बाद सहमति बनी। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2027 का विधानसभा चुनाव है। ऐसे में संगठन का ऐसा चेहरा चाहिए था जो सभी कार्यकर्त्ताओं को साथ लेकर चले। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ समन्वय और सहयोग के साथ काम करे और जिसकी अपनी खुद की बिरादरी पर जबरदस्त पकड़ हो।पंकज चौधरी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह गोरखपुर के ही रहने वाले हैं। वह यहीं जन्में, यहीं उनकी शिक्षा हुई और यहीं उनका कारोबार आयुर्वेदिक तेल, राहत रोग कंपनी, हरबंस राय भगवान स्थित है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग में यादवों 11 फीसद के बाद दूसरी सबसे बड़ी बिरादरी कुर्मी 8 फीसद है। दिलचस्प है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव बिरादरी के पांच सांसद जो सभी अखिलेश यादव के परिवार के हैं जीते थे और कुर्मी सांसदों की संख्या 12 थी। जिनमें 8 सांसद समाजवादी पार्टी के जीते थे। 3 भाजपा के और 1 उनके सहयोगी दल अपना दल (सोनेलाल पटेल) अनुप्रिया पटेल जीती थी। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को बहुत तगड़ा झटका दिया था। उसकी मुख्य वजह पिछड़ी जातियों के बड़े हिस्से का अखिलेश यादव के पीडीए को समर्थन देना रहा। भाजपा ने 75 सीटों पर चुनाव लड़ा था और वह 33 ही जीत पाई थी। दो सीटें बिजनौर से चंदन चौहान समेत आरएलडी की और एक अपना दल की जीती थी। जबकि इंडिया गठबंधन को 43 सीटें मिली थीं। जिसमें 37 सीटें सपा को मिली थी। 

लोकसभा चुनाव में पीडीए के पक्ष में पिछड़ी जातियों, दलितों, मुस्लिमों के गठजोड़ ने भाजपा को केंद्र में पूर्ण बहुमत पाने से रोक दिया था। यदि 2027 के विधानसभा चुनावों में यूपी में लोकसभा वाले समीकरण बने रहते हैं तो उस हालत में भाजपा निश्चित ही सत्ता से बाहर हो जाएगी। इसलिए भाजपा नेतृत्व की चिंता और कोशिश उन समीकरणों को अपने पक्ष में करने की रही है और संभवतः इसी उधेड़बुन में खुद को एक सही व्यक्ति की तलाश करने में लंबा समय लगा। उत्तर प्रदेश में अभी भी अगड़ी जातियों, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य मतदाताओं का रूझान छोटी-मोटी शिकायतों और नाराजगियों के बावजूद भाजपा के पक्ष में बना हुआ है। भाजपा ने पिछड़ी बिरादरियों में अपनी जमीन अवश्य गंवाई है। अमित शाह जैसे दिग्गज की पसंद केशव प्रसाद मौर्य रहे हैं। लेकिन पंकज चौधरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंद हैं। वह उनके मंत्रिमंडल में 7 जुलाई 2021 से वित्त राज्यमंत्री बने हैं। 20 नवंबर 1964 को गोरखपुर में जन्में पंकज चौधरी 1989 में गोरखपुर नगर निगम में पार्षद और डिप्टी मेयर बने। 1991 में वह पहली बार गोरखपुर मंडल की महाराजगंज सीट से लोकसभा का चुनाव जीते तो फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी माता उज्जवल चौधरी महाराजगंज की जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं। वह एक अनुभवी राजनेता हैं और अपनी सालीन छवि और लोगों से मधुर संबंध बनाए रखने के लिए लोकप्रिय हैं। उनकी अपनी संसदीय क्षेत्र महाराजगंज में अपने मतदाताओं पर मजबूत पकड़ का इसी से पता चलता है कि वह 1991, 1996, 1998, 2004, 2014, 2019 और 2024 के सभी चुनाव वह जीते हैं। पिछले चुनाव में उनकी जीत का अंतर जरूर कम हुआ था। 2019 के चुनाव में जहां उन्हें 726349 वोट मिले थे और वह कांग्रेस प्रत्याशी 555859 को 35551 वोटों के अंतर से ही हरा पाए थे। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने 726349 वोट प्राप्त किए थे।

उत्तर प्रदेश में संगठन और सत्ता दोनों का केंद्र पूर्वांचल का गोरखपुर बन जाएगा। अध्यक्ष पद से मुक्त हो रहे जाट बिरादरी के चौधरी भूपेंद्र सिंह का ताल्लुक पश्चिमी उत्तर प्रदेश से रहा है। उनकी एकमात्र खूबी उनको सुनील बंसल और अमित शाह का समर्थन प्राप्त होना रहा है। 1980 से अभी तक उत्तर प्रदेश भाजपा ने 15 अध्यक्ष देखे हैं। इन 45 वर्षों में 6 अध्यक्ष ब्राह्मण, 3 कुर्मी, 1 लोधी (कल्याण सिंह), 1 राजपूत (राजनाथ सिंह), 1 भूमिहार (सूर्य प्रताप शाही), 1 सैनी (केशव प्रसाद मौर्य), 1 जाट (चौधरी भूपेंद्र सिंह) रहे हैं। पंकज चौधरी भाजपा के 16 वें अध्यक्ष होंगे। कलराज मिश्रा दो बार अध्यक्ष बने और वह पहली बार 1991 से 1997 तक छह साल अध्यक्ष रहे। इनके कार्यकाल में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने और 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी। कलराज मिश्रा दूसरी बार अगस्त 2002 में अध्यक्ष बने और दो साल इस पद पर रहे। कुर्मी बिरादरी के ओमप्रकाश सिंह, विनय कटियार और स्वतंत्रदेव सिंह बहुत ज्यादा सफल नहीं रहे। योगी आदित्यनाथ स्वतंत्र देव सिंह को अध्यक्ष बनवाने को प्रयासरत थे लेकिन चली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। संघ की सहमति भी नए अध्यक्ष के चयन के लिए विलंब का कारण बनी। भाजपा के संगठन के महामंत्री और संघ के प्रतिनिधि कर्नाटक के बीएल संतोष ऐसा व्यक्ति चाहते थे जो योगी आदित्यनाथ के साथ तालमेल से काम करे।
भाजपा का नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में जो उदय हुआ है। उसकी तीन प्रमुख वजहें हैं नेतृत्व की विश्वसनीयता और खरापन, ऊंची जातियों का भाजपा के पक्ष में संगठित होना और पिछड़ी जातियों की गोलबंदी। जहां और जब कभी इसमें कमी आई भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। अपने इसी फार्मूले को साधकर ही भाजपा 2027 का विधानसभा चुनाव जीत सकती है। इसके लिए मुख्यमंत्री पद पर योगी आदित्यनाथ का बने रहना और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाना भी अनिवार्य शर्त है। योगी आदित्यनाथ पूर्वांचल के हैं लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी जबरदस्त लोकप्रियता है। भाजपा के पास पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोई भी लोकप्रिय और दमदार नेता नहीं है। इस तरह से कुल मिलाकर पंकज चौधरी अध्यक्ष पद के लिए बेहतर पसंद के रूप में उभरे हैं। हालांकि पिछले लंबे अर्से से उनके नाम की अटकलें राजनीतिक क्षेत्रों में बनी हुई थी। शायद उसकी बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उन्हें समर्थन प्राप्त होना रहा। 
उत्तर प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में बनारस का प्रतिनिधित्व करते हैं। तीनों बार उन्होंने यूपी से ही लोकसभा में जाना पसंद किया। नए अध्यक्ष को संगठन को चुनाव के लिए तैयार करने का एक-सवा साल का अच्छा- खासा वक्त मिल जाएगा। उन्हें गोरखपुर के बाहर कोई नहीं जानता। उनको पूरे प्रदेश में सघन दौरे करने होंगे। गुटबाजी को दूर करना होगा और कार्यकर्त्ताओं को साथ लेकर सीधे-सीधे मतदाताओं से जुड़ना होगा। यह देखना रूचिकर होगा कि वे अपनी मुहिम में कितने सफल रह पाते हैं।

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