हिमानी पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।
पूर्वानुमान के अनुसार खतौली विधानसभा उपचुनाव में इस बार दलित वोट निर्णायक रहे। यह सब जानते हुए भी भाजपा दलित वोट साधने में नाकाम रही और चंद्रशेखर रावण का जादू चल गया, जिसके चलते चुनाव परिणाम में भाजपा चारों खाने चित और गठबंधन की बल्ले बल्ले हो गई।
राजनीति के जानकारों के अनुसार उपचुनाव में भाजपा तो हारी ही है, लेकिन जीत हासिल करने का दंभ भरने वाले गठबंधन के घटक दलों की भी असल में जीत नहीं हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भारत में गठबंधन का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही इसकी असफलता का इतिहास भी है। अब तक क्षेत्रीय राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति गठबंधन होते रहे हैं, लेकिन कोई भी गठबंधन स्थाई नहीं रहा। जब भी किसी की महत्वाकांक्षा ने जैसे ही सर उठाना शुरू किया, वैसे ही गठबंधन में दरार पड़ती नजर आने लगी। केवल उत्तर प्रदेश में की समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी व कांग्रेस तथा बहुजन समाज पार्टी व भाजपा आदि के गठबंधन का हस्र सभी ने देखा है।
उपचुनाव में ही समाजवादी पार्टी के बेस वोट बैंक यानी मुस्लिमों को अलग कर दिया जाए तो जीत के बाद आज भी राष्ट्रीय लोक दल खाली हाथ नजर आती है। इस राजनीतिक विश्लेषण से समाजवादी पार्टी के नेता भी अनजान नहीं हैं। इसके अलावा इस उपचुनाव में निर्णायक साबित हुए दलित वोट बैंक पर आजाद समाज पार्टी के बढ़ते असर से आसपा प्रमुख चंद्रशेखर रावण की खबर नहीं है।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि समूचे विपक्ष ने व्यूह की रचना करके खतौली उपचुनाव में तात्कालिक सफलता को प्राप्त कर ली है, लेकिन सदन में राष्ट्रीय लोक दल के विधायक के रूप में बैठे समाजवादी पार्टी के नेता अजीब स्थिति पैदा कर सकते हैं। जब तक गठबंधन है चलो तब तक तो स्थिति ठीक मानी जा सकती है, लेकिन अगर कल गठबंधन नहीं रहा तो स्थिति क्या होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
खतौली उपचुनाव मैं हार के बाद ताजा स्थिति पर भारतीय जनता पार्टी ने मंथन शुरू कर दिया है। हालांकि भाजपा पर ओवर आल ज्यादा असर नहीं पड़ा है। भाजपा ने अगर खतौली की सीट गवाई है तो उससे भी अधिक उपलब्धि उसने रामपुर की हथियाकर प्राप्त कर ली है। सूत्रों की माने तो रामपुर में भाजपा ने पहली बार जीत हासिल की है। खतौली विधान सभा क्षेत्र की बात करें तो यह सीट परंपरागत रूप से राष्ट्रीय लोक दल (गठबंधन) की ही मानी जाती रही है। बावजूद खतौली सीट पर राष्ट्रीय लोक दल की जीत का वायस बने गठबंधन के घटक दलों में विघटन पैदा करना भारतीय जनता पार्टी के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है और अगर आगामी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जीत हासिल करनी हैं तो उसके लिए यह है जरूरी भी है।
हालिया परिस्थितियों में गठबंधन के घटक दलों में आजाद समाज पार्टी सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कमजोर मोहरा है, जिसको अपने पाले में बनाए रखना गठबंधन के लिए जितना मुश्किलों भरा हो सकता है, भारतीय जनता पार्टी के लिए यह है उतना ही आसान होगा। अगर ऐसा हुआ तो आने वाला समय गठबंधन के लिए कम से कम खतौली सीट पर चुनौती भरा हो सकता है।
खतौली, जिला-मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश

