पार्वती की तपस्या विषयक दृढ़ता, उनका पहले से भी उग्र तप, उससे त्रिलोकी का संतप्त होना तथा समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा और विष्णु का भगवान् शिव के स्थान पर जाना
पार्वती के श्रेष्ठ तप को देखकर सब देवता उनके उत्तम तेज से व्याप्त हो गये। उन्होंने तपस्या में लगी हुई उन तेजोमयी जगदम्बा को नमस्कार किया और साक्षात् सिद्धि स्वरूपा शिवा देवी के तप की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए वे सब देवता उस स्थान पर गये, जहां भगवान् वृषध्वज विराजमान थे।
मुने! वहां पहुंचकर सब देवताओं ने पहले तुम्हें उनके पास भेजा और स्वयं वे मदनदहनकारी भगवान् हर से दूर ही खड़े रहे। वे वहीं से यह देखते रहे कि भगवान् शिव कुपित हैं या प्रसन्न। नारद! तुम तो सदा निर्भय रहने वाले और विशेषतः शिव के भक्त हो। अतः तुमने भगवान् शिव के स्थान पर जाकर उन्हें सर्वथा प्रसन्न देखा। फिर वहां से लौटकर तुम श्रीविष्णु आदि सब देवताओं को भगवान् शिव के स्थान पर ले गये। वहां पहुंचकर विष्णु आदि सब देवताओं ने देखा कि भक्तवत्सल भगवान् शिव सुखपूर्वक प्रसन्न मुद्रा में बैठे हैं।
अपने गणों से घिरे हुए शम्भु तपस्वी का रूप धारण किये हुए योगपट्ट पर आसीन थे। उन परमेश्वररूपी शंकर का दर्शन करके मेरे सहित श्रीविष्णु तथा अन्य देवताओं, सिद्धों और मनिश्वरों ने उन्हें प्रणाम करके वेदों और उपनिषदों के सूत्रों द्वारा उनक स्तवन किया। (अध्याय 23) (शेष आगामी अंक में)
