शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (538) गतांक से आगे......

पार्वती की तपस्या विषयक दृढ़ता, उनका पहले से भी उग्र तप, उससे त्रिलोकी का संतप्त होना तथा समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा और विष्णु का भगवान् शिव के स्थान पर जाना 

देवताओं ने कहा- भगवन्! जो महाभयंकर कालाग्नि के समान दीप्तिमान और भयानक नेत्रों से युक्त हैं, उन रोष भरे महाप्रभु रूद्र के पास हम लोग नहीं जा सकेंगे, क्योंकि जैसे पहले उन्होंने कुपित हो दुर्जय काम को भी जला दिया था, उसी प्रकार वे हमें भी दग्ध कर डालेंगे-इसमें संशय नहीं है। 

मुने! इन्द्रादि देवताओं की बात सुनकर लक्ष्मीपति श्रीहरि ने उन सबको सांत्वना देते हुए कहा। 

श्रीहरि बोले- हे देवताओं! तुम सब लोग प्रेम और आदर के साथ मेरी बात सुनों। भगवान् शिव देवताओं के स्वामी तथा उनके भय का नाश करने वाले हैं। वे तुम्हें दग्ध नहीं करेंगे। तुम सब लोग बड़े चतुर हो। अतः तुम्हें कल्याणकारी मानकर हमारे साथ सबके उत्तम प्रभु उन महादेव जी की शरण में चलना चाहिए। भगवान् शिव पुराणपुरूष, सर्वेश्वर, वरणीय, परात्पर, तपस्वी और परमात्मास्वरूप हैं, अतः हमें उनकी शरण में अवश्य चलना चाहिए। प्रभावशाली विष्णु के ऐसा कहने पर सब देवता उनके साथ पिनाकपाणि शिव का दर्शन करने के लिए गये। मार्ग में पार्वती का आश्रम पहले पड़ता था। अतः उन गिरिराजनन्दिनी की तपस्या देखने के लिए विष्णु आदि सब देवता कौतुहलपूर्वक उनके आश्रम पर गये। (शेष आगामी अंक में)

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