देवताओं का भगवान् शिव से पार्वती के साथ विवाह करने का अनुरोध्, भगवान् का विवाह के दोष बताकर अस्वीकार करना तथा पुनः प्रार्थना करने पर स्वीकार कर लेना
श्रीहरि एवं इन्द्र आदि देवताओं ने जब परमेश्वर शिव को ध्यानमग्न देखा, तब उन्होंने नन्दी की सम्मति ली। नन्दी ने पुनः दीनभाव से स्तुति करने के लिए कहा। उनकी इस सत्पम्मति के अनुसार देवता स्तुति करने लगे। वे बोले-देवदेव! महादेव! करूणा सागर प्रभो! हम आपकी शरण में आये हैं। आप महान् क्लेश से हमारा उद्धार कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! इस प्रकार बहुत दीनतापूर्ण उक्ति से देवताओं ने भगवान् शंकर की स्तुति की। इसके बाद वे सब देवता प्रेम से व्याकुलचित्त हो उच्च स्वर से फूट-फूट कर रोने लगे। मेरे साथ भगवान् श्रीहरि उत्तम भक्तिभाव से युक्त हो मन-ही-मन भगवान् शम्भु का स्मरण करते हुए अत्यन्त दीनतापूर्ण वाणी द्वारा उनसे अपना अभिप्राय निवेदन करने लगे।
देवताओं के मेरे तथा श्रीहरि के इस प्रकार बहुत स्तुति करने पर भगवान् महेश्वर अपनी भक्तवत्सलता के कारण ध्यान से विरत हो गये। उनका मन अत्यन्त प्रसन्न था। वे भक्तवत्सल शंकर श्रीहरि आदि को करूणा दृष्टि से देखकर उनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले- विष्णो! ब्रह्मन्! तथा इन्द्र आदि देवताओं! तुम सब लोग एक साथ यहां किस अभिप्राय से आये हो? मेरे सामने सच-सच बताओ। (शेष आगामी अंक में)
