देवताओं का भगवान् शिव से पार्वती के साथ विवाह करने का अनुरोध्, भगवान् का विवाह के दोष बताकर अस्वीकार करना तथा पुनः प्रार्थना करने पर स्वीकार कर लेना
काम से क्रोध होता है, क्रोध से मोह और मोह से तपस्या नष्ट होती है। अतः तुम सभी श्रेष्ठ देवताओं को काम और क्रोध का परित्याग कर देना चाहिए, मेरे इस कथन को कभी अन्यथा नहीं मानना चाहिए।
कामो हि नरकायैव तस्मात् क्रोधोअभिजायते।
क्रोधा(वति सम्मोहो मोहाच्च भ्रंशते तपः।।
कामक्रोधी परिज्यातौ भवद्धि: सुरसत्तमैः।
सवैरिव च मन्तव्यं मद्वाक्यं नान्यथा क्वचित्।। (शि.पु.रू.सं.पा.खं.24/27-28)
ब्रह्माजी कहते हैं- नारद! वृषभ के चिन्ह से युक्त ध्वजा धारण करने वाले भगवान् महादेव ने इस प्रकार की बातें सुनाकर ब्रह्मा, विष्णु, देवताओं तथा मुनियों को निष्काम धर्म का उपदेश दिया। तदनन्तर भगवान् शम्भु पुनः ध्यान लगाकर चुप हो गये और पहले की ही भांति पार्षदों से घिरे हुए सुस्थिर भाव से बैठ गये। वे अपने मन में ही स्वयं आत्मस्वरूप, निरंजन, निराभास, निर्विकार, निरामय, परात्पर, नित्य ममता रहित, निरवग्रह, शब्दातीत, निर्गुण, ज्ञानगम्य एवं प्रकृति से पर परमात्मा का चिन्तन करने लगे। इस प्रकार का चिन्तन करते हुए वे ध्यान में स्थित हो गये। बहुत से प्राणियों की सृष्टि करने वाले भगवान् शिव का ध्यान करते-करते ही परमानन्द में निमग्न हो गये।
(शेष आगामी अंक में)
