शिवपुराण से (रूद्र संहिता तृतीय पार्वती खण्ड) (542) गतांक से आगे......

देवताओं का भगवान् शिव से पार्वती के साथ विवाह करने का अनुरोध्, भगवान् का विवाह के दोष बताकर अस्वीकार करना तथा पुनः प्रार्थना करने पर स्वीकार कर लेना

मेरा यह कथन सर्वथा सत्य है। महादेव! इस प्रकार विचार करके आप कृपा करें। आपको नमस्कार है। स्वामिन् तारकासुर के द्वारा उपस्थित किये गये इस कष्ट से आप देवताओं का उद्धार कीजिये। देव! शम्भो! आप दाहिने हाथ से गिरिजा का पाणिग्रहण करें। गिरिराज हिमवान् के द्वारा दी हुई महानुभावा पार्वती को प्राणिग्रहण के द्वारा ही अनुगृहित कीजिये। 

श्रीविष्णु का यह वचन सुनकर योगपरायण भगवान् शिव ने उन सबको उत्तम गति का दर्शन कराते हुए इस प्रकार कहा- देवताओं! ज्यों ही मैंने सर्वांगसुन्दरी गिरिजा देवी को स्वीकार किया, त्यों ही समस्त सुरेश्वर तथा ट्टषि-मुनि सकाम हो जायेंगे। फिर तो वे परमार्थ पथ पर चलने में समर्थ न हो सकेंगे। दुर्गा अपने पाणिग्रहण मात्र से ही कामदेव को जीवित कर देंगी। विष्णों! मैंने कामदेव को जलाकर देवताओं का बहुत बड़ा कार्य सि( किया है। आज से सब लोग मेरे साथ सुनिश्चितरूप से निष्काम होकर रहें। देवताओं! जैसे मैं हूं, उसी तरह तुम सब लोग पृथक-पृथक रहकर कोई विशेष प्रयत्न किये बिना ही अत्यन्त दुष्कर एवं उत्तम तपस्या कर सकोगे। अब उस मदन के न होने से तुम सब देवता समाधि के द्वारा परमानन्द अनुभव करते हुए निर्विकार हो जाओ, क्योंकि काम नरक की ही प्राप्ति कराने वाला है।                      (शेष आगामी अंक में)

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