श्री शिव की आराधना के लिए पार्वती जी की दुष्कर तपस्या
वे कल्याणकारी भगवान् शिव यहां मुझपर प्रसन्न हों। यदि मैंने नारदतन्त्रोक्त शिवपंचाक्षर मंत्र का सदा उत्तम भाव से विधिपूर्वक जप किया हो तो भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों। यदि मैं सर्वेश्वर शिव की भक्ति से युक्त एवं निर्विकार होऊं तो भगवान् शंकर मुझपर अत्यन्त प्रसन्न हों।
इस तरह नित्य चिन्तन करती हुई जटा-वल्कलधारिणी निर्विकारा पार्वती मुंह नीचे किये सुदीर्घकाल तक तपस्या में लगी रहीं। उन्होंने ऐसी तपस्या की, जो मुनियों के लिए भी दुष्कर थी। वहां उस तपस्या का स्मरण करके पुरूषों को बड़ा विस्मय हुआ। महर्षे! पार्वती की तपस्या का जो दूसरा प्रभाव पड़ा था, उसे भी इस समय सुनो। जगदम्बा पार्वती का वह महान् तप परम आश्चर्यजनक था। जो स्वभावतः एक- दूसरे के विरोधी थे, ऐसे प्राणी भी उस आश्रम के पास जाकर उनकी तपस्या के प्रभाव से विरोधरहित हो जाते थे। सिंह और गौ आदि सदा रागादि दोषों से संयुक्त रहने वाले पशु भी पार्वती के तप की महिमा से वहां परस्पर बाधा नहीं पहुंचाते थे। मुनिश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त जो स्वाभावतः एक-दूसरे के वैरी हैं, वे चूहे-बिल्ली आदि दूसरे-दूसरे जीव भी उस आश्रम पर कभी रोष आदि विकारों से युक्त नहीं होते थे। वहां के सभी वृक्षों में सदा फल लगे रहते थे। भांति-भांति के तृण और विचित्र पुष्प उस वन की शोभा बढ़ाते थे। वहां का सारा वनप्रान्त कैलास के समान हो गया। पार्वती के तप की सिद्धि का साकार रूप बन गया। (अध्याय 22) (शेष आगामी अंक में )
